यूरिया का संतुलित उपयोग
Submitted by Anand on 19 July 2019 - 1:44pmदेश में साल दर साल बढ़ते कृषि उत्पादन और सतत् खाद्य सुरक्षा में फसलों के पोषण की अहम भूमिका है। संतुलित पोषण से ऊर्जावान खेत किसान को अधिकाधिक उपज की भेंट देते हैं। नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश मुख्य पोषक तत्व हैं, जो अधिकांश खेतों में लगभग अनिवार्य रूप से लगाए जाते हैं। इसके अलावा सल्फर, जिंक और बोरोन कुछ महत्वपूर्ण सूक्ष्म पोषक तत्व हैं, जिन्हें भूमि की जरूरत के हिसाब से किसान खेतों में डालते हैं। इन सबके बीच यदि सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व की बात करें तो नाइट्रोजन का नाम सबसे ऊपर आता है। खेतों में नाइट्रोजन की आपूर्ति मुख्य रूप से यूरिया नामक उर्वरक द्वारा की जाती है। यूरिया में 46 प्रतिशत Read More : यूरिया का संतुलित उपयोग about यूरिया का संतुलित उपयोग
सेब में पोटेशियम (K) की भूमिका
Submitted by Anand on 19 July 2019 - 1:43pmपोटेशियम एक प्राथमिक सेब का पोषक तत्व है, जो उच्च गुणवत्ता वाले फल और अधिकतम पैदावार प्राप्त करने में एक प्रमुख भूमिका निभाता है| पोटेशियम नाइट्रोजन के बाद पौधों के लिए ज़रूरी दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व है जो कई वनस्पति विकास की प्रक्रिया के लिए आवश्यक है। सेब के पेड़ किसी भी अन्य पोषक तत्वों से अधिक मात्रा में पोटेशियम को अवशोषित करते है| सेब के पेड़ को नाइट्रोजन की तुलना में पोटेशियम की लगभग दोगुनी मात्रा की आवश्यकता होती है। अधिक पैदावार और गुणवत्ता के लिए फलों को पोटेशियम की उच्च मात्रा की आवश्यकता होती है। पोटेशियम पौधों के किसी भी भाग को नहीं बनता है, इसलिए इसकी भूमिका अप्रत् Read More : सेब में पोटेशियम (K) की भूमिका about सेब में पोटेशियम (K) की भूमिका
नीलगाय के आतंक से न हों परेशान
Submitted by Anand on 19 July 2019 - 1:41pmअन्नदाताओं को अब नीलगाय के आतंक से परेशान होने की जरूरत नहीं है। अब उन्हें बिना मारे ही इनके आतंक से छुटकारा मिलेगा, वहीं फसलों की भी सुरक्षा होगी। नीलगाय को खेतों की ओर आने से रोकने के लिए हर्बल घोल तैयार किया जाता है जिसके प्रयोग करनें से नीलगाय फसलों को नुकसान नहीं पहुचती है Read More : नीलगाय के आतंक से न हों परेशान about नीलगाय के आतंक से न हों परेशान
ह्यूमस की प्राप्ति के दो स्रोत हैं
Submitted by Anand on 19 July 2019 - 1:40pmकिसी एक भूमि में बारबार फसल के उगाने और उसमें खाद न देने से कुछ समय के बाद भूमि अनुत्पादक और ऊसर हो जाती है। भूमि की उर्वरता के नाश होने का प्रमुख कारण भूमि से उस पदार्थ का निकल जाना है जिसका नाम 'ह्यूमस (Humus) दिया गया है। ह्यूमस कार्बनिक या अखनिज पदार्थ है जिसकी उपस्थिति से ही भूमि उर्वर होती है। वस्तुतः ह्यूमस वानस्पतिक और जांतव पदार्थों के विघटन से बनता है। सामान्य हरी खाद, गोबर, कंपोस्ट इत्यादि खादों और पेड़ पौधों, जंतुओं और सूक्ष्म जीवाणुओं से यह बनता है। ह्यूमस के अभाव में मिट्टी मृत और निष्क्रिय हो जाती है और उसमें कोई पेड़ पौधे नहीं उगते। Read More : ह्यूमस की प्राप्ति के दो स्रोत हैं about ह्यूमस की प्राप्ति के दो स्रोत हैं
देशी केंचुए मिटटी में किस तरह काम करते हैं और इनके काम का क्या फायदा होता है ?
Submitted by Anand on 19 July 2019 - 1:39pmकिसान अपने खेतो में वो सब कुछ करता है जो उसकी फसल एवं उत्पादन के लिए आवश्यक है पर वह कुछ गलतियों उनके द्वरा हो जाती है जिससे उत्पादन में कमी और मिट्टी की गुणवत्ता पर बुरा असर पढता है मिट्टी की गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए हमें मिट्टी को पलते रहना चाहिए, मिट्टी ऊपर की मिट्टी नीचे नीचे की ऊपर ऊपर की नीचे ,नीचे की ऊपर ये केंचुआ ही करता है, केंचुआ किसान का सबसे अच्छा दोस्त है, एक केंचुआ साल भर जिंदा रहे तो एक वर्ष मे 20 मीट्रिक टन मिट्टी को उल्ट पलट कर देता है और उतनी ही मिट्टी को ट्रैक्टर से उल्ट पलट करना पड़े तो हजारो रूपये का डीजल लग जाता है! Read More : देशी केंचुए मिटटी में किस तरह काम करते हैं और इनके काम का क्या फायदा होता है ? about देशी केंचुए मिटटी में किस तरह काम करते हैं और इनके काम का क्या फायदा होता है ?
भारत में प्रभावी जल प्रबंधन की जरूरत
Submitted by Anand on 19 July 2019 - 1:37pmभारत में भी वही तमाम समस्याएं हैं जिसमें पानी की बचत कम, बर्बादी ज्यादा है। यह भी सच्चाई है किबढ़ती आबादी का दबाव, प्रकृति से छेड़छाड़ और कुप्रबंधन भी जल संकट का एक कारण है। पिछले कुछ सालों सेअनियमित मानसून और वर्षा ने भी जल संकट और बढ़ा दिया है। इस संकट ने जल संरक्षण के लिए कई राज्यों कीसरकारों को परंपरागत तरीकों को अपनाने को मजबूर कर दिया है। देश भर में छोटे- छोटे बांधों के निर्माण औरतालाब बनाने की पहल की गयी है। इससे पेयजल और सिंचाई की समस्या पर कुछ हद तक काबू पाया जा सका है।भारत में तीस प्रतिशत से अधिक आबादी शहरों में रहती है। आवास और शहरी विकास मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं किदेश के लगभ Read More : भारत में प्रभावी जल प्रबंधन की जरूरत about भारत में प्रभावी जल प्रबंधन की जरूरत
पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों का वर्गीकरण
Submitted by Anand on 19 July 2019 - 1:36pmपौधे जडो द्वारा भूमि से पानी एवं पोषक तत्व, वायु से कार्वन डाई आक्साइड तथा सूर्य से प्रकाश ऊर्जा लेकर अपने विभिन्न भागों का निर्माण करते है।
पोषक तत्वों को पौधों की आवश्यकतानुसार निम्न प्रकार वर्गीकृत किया गया है।
मुख्य पोषक तत्व- नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश।
गौण पोषक तत्व- कैल्सियम, मैग्नीशियम एवं गन्धक।
सूक्ष्म पोषक तत्व- लोहा, जिंक, कापर, मैग्नीज, मालिब्डेनम, बोरान एवं क्लोरीन।
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स्ट्राबेरी क्या है जानें स्ट्राबेरी की खेती करें उचित प्रकार
Submitted by neetu on 19 July 2019 - 1:35pmस्ट्राबेरी एक महत्वपूर्ण नरम फल है। जिसको विभिन्न प्रकार की भूमि तथा जलवायु में उगाया जा सकता है। इसका पौधा कुछ ही महीनों में फल दे सकता है। इस फसल का उत्पादन बहुत लोगों को रोजगार दे सकता है। स्ट्रॉबेरी एंटीऑक्सिडेंट, विटामिन 'सी' , प्रोटीन और खनिजों का एक अच्छा प्राकृतिक स्रोतों है।
स्ट्राबेरी की कौन - कौन किस्में है जानें एस तरह
स्ट्राबेरी की बहुत सी किस्में उगाई जाती हैं। परन्तु मुख्यत: निम्नलिखित किस्मों का उत्पादन हरियाणा में किया जाता है।
गाजर की खेती कैसे करें
Submitted by Pari Mam on 19 July 2019 - 1:32pmगाजर एक मूल्यवान सब्जी है जिसका प्रयोग भारत के सभी प्रान्तों में होता है । गाजर का मूल स्थान पंजाब तथा कश्मीर है । इसकी जड़ को कच्चा, पकाकर तथा अचार बनाकर प्रयोग करते हैं । इसके अतिरिक्त हलुवा, रायता तथा जूस बनाकर प्रयोग करते हैं । गाजर के अन्दर कैरीटीन, थायेमिन, राईबोफिलेविन तथा विटामिन ‘ए’ की मात्रा अधिक पायी जाती है । हृदयरोग के लिए इसका मुरब्बा उपयुक्त रहता है ।
गाजर की खेती के लिए आवश्यक भूमि व जलवायु
इसकी फसल को लगभग हर प्रकार की भूमि में उगाया जाता है लेकिन सबसे उपयुक्त बलुई दोमट भूमि होती है । मिट्टी उपजाऊ हो तथा जल-निकास का उचित प्रबन्ध हो | Read More : गाजर की खेती कैसे करें about गाजर की खेती कैसे करें
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