कामयाबी के लिए झटके लगना क्यों है ज़रूरी?

कामयाबी के लिए झटके लगना क्यों है ज़रूरी?

साल 2008 के बीजिंग ओलंपिक में एनी वर्नोन ब्रिटेन की क्वाड स्कल्स रोइंग महिला टीम में थी. 25 साल की वर्नोन अनुभवी सदस्यों वाली टीम की सबसे युवा सदस्य थी.

उनकी टीम ओलंपिक में महिलाओं की रोइंग का पहला गोल्ड मेडल जीतने के करीब थी, लेकिन बेहद ही करीबी मुक़ाबले ने चीन की टीम ने बाज़ी मार ली.

वर्नोन टूट गई. हार से उनको सदमा लगा. खेल के मनोविज्ञान पर लिखी अपनी किताब "माइंड गेम्स" को प्रोमोट करने के लिए दिए इंटरव्यू में उन्होंने इसे "करियर का निर्णायक पहलू" कहा.

हार का सदमा

हममें से जो लोग एलीट एथलीट नहीं हैं, उनके लिए यह समझना कठिन है कि जीत के करीब पहुंचकर चूक जाने का दर्द क्या होता है.

शीर्ष स्तर का प्रदर्शन करने के लिए बहुत मानसिक प्रयास की ज़रूरत होती है और जब आप जीत के बारे में बहुत ज़्यादा फिक्र करते हैं तो हार जाना क्रूर सज़ा की तरह लगता है.

शीर्ष एथलीट, और कुछ अन्य लोग भी, इस दर्द को ईंधन बना लेते हैं. हार उनके लिए अगली बार ख़ुद को और आगे बढ़ाने का कारण बन जाती है.

वर्नोन अपनी निराशा से उबर गई. 2010 में उन्होंने रोइंग वर्ल्ड चैंपियनशिप जीती.

एलीट खेलों में निवेश करने वाली ब्रिटेन की सरकारी संस्था यूके स्पोर्ट ने एथलेटिक्स में क़ामयाबी दिलाने वाले कारणों की पड़ताल करके रिपोर्ट छापी है.

85 एलीट एथलीटों और कोच का इंटरव्यू करके यह जानने की कोशिश की गई कि वह क्या चीज है जो असाधारण उपलब्धियां हासिल करने वाले एथलीटों में आम है.

शोधकर्ताओं ने पाया कि ज़्यादातर एथलीटों को उनके करियर की शुरुआत में बड़ा झटका लगता है, लेकिन कुछ एथलीट दूसरों से अलग प्रतिक्रिया करते हैं.

असाधारण एथलीटों के लिए झटके ने उनकी प्रेरणा को बढ़ाया और बाद में वे ओलंपिक मेडल तक जीत गए. जो सिर्फ़ "अच्छे" थे, उनके लिए चूक जाना हतोत्साहित करने वाला रहा.

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चूक से मिली प्रेरणा

पहले स्थान की जगह दूसरे स्थान पर रह जाना भी बेहतर होने के लिए प्रेरित कर सकता है.

वर्जीनिया यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री एडम लीव ने 1846 से 1948 के बीच ओलंपिक की ट्रैक एंड फील्ड प्रतियोगिताओं में मेडल जीतने वालों का डेटाबेस तैयार किया है. उन्होंने देखा कि मेडल जीतने के बाद एथलीटों की ज़िंदगी में क्या हुआ.

लीव ने पाया कि जो एथलीट पहले स्थान पर आने से चूक गए थे, वे लंबी उम्र तक जिए और अपनी ज़िंदगी में जीतने वालों से ज़्यादा सफल रहे.

चांदी का तमगा जीतने वाले खिलाड़ी खेल के बाद के करियर में ज़्यादा महत्वाकांक्षी थे. उन्होंने बेहतर वेतन वाली नौकरियां ढूंढ़ीं.

80 साल की उम्र तक उनमें से आधे से ज़्यादा लोग ज़िंदा हैं. स्वर्ण पदक जीतने वाले सिर्फ़ एक तिहाई लोग जीवित हैं. ऐसा लगता है कि हार के सदमे ने उनको जीने के लिए प्रेरित किया.

सबसे आगे से थोड़ा पीछे

ऐसा सिर्फ़ खेलों की दुनिया में नहीं है. फ़िजिक्स एंड सोसाइटी जर्नल में हाल ही में छपे एक रिसर्च पेपर के मुताबिक जिन वैज्ञानिकों को करियर की शुरुआत में झटके लगे उन्होंने बाद में दूसरों से बेहतर प्रदर्शन किया.

इस रिसर्च पेपर के लेखकों- यांग वांग, बेंजामिन जोन्स और दासुन वांग- ने यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ हेल्थ में फ़ंड के लिए आवेदन करने वाले जूनियर वैज्ञानिकों के आंकड़ों को देखा.

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उन्होंने दो समूहों को चिह्नित किया- करीब से चूक गए वैज्ञानिक जिनके प्रस्ताव मंजूर होते-होते रह गए और दूसरे वे वैज्ञानिक जिनके प्रस्ताव कट-ऑफ़ से बस थोड़े ही ऊपर थे.

फ़ंड पाने से रह गए जूनियर वैज्ञानिकों में 10 में से एक सिस्टम से पूरी तरह गायब हो गए. जो लगे रहे उनके अगले 10 साल में विजेताओं की तुलना में ज़्यादा और प्रभावी रिसर्च पेपर छपे.

माता-पिता को खोने का सदमा

बचपन में लगे झटके जीवन पर इसी तरह से असर डालते हैं. मनोवैज्ञानिक मार्विन आइसेनस्टैड ने माता-पिता की मृत्यु और उपलब्धियों के संबंध का अध्ययन किया है.

उन्होंने इनसाइक्लोपीडिया में एक कॉलम से ज़्यादा जगह पाने वाली 573 हस्तियों की ज़िंदगी के बारे में जानकारी जुटाई तो पाया कि करीब आधे लोगों के माता या पिता का निधन उनके 20 साल के होने से पहले हो गया था.

कोई नहीं चाहेगा कि किसी बच्चे के माता या पिता का निधन हो जाए. इससे मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का ख़तरा बढ़ता है.

लेकिन यह भी सच है कि बड़ी उपलब्धियां पाने वालों में आश्चर्यजनक रूप से ऐसे ढेरों लोग शामिल हैं जिन्हें बचपन में परिजनों के शोक या किसी दूसरे आघात का सामना करना पड़ा था.

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बीटल्स का उदाहरण

सबसे मशहूर उदाहरण बीटल्स बैंड का है, जिसके चार में से तीन सदस्यों ने बचपन में सदमा झेला था.

पॉल मैकार्टिनी जब 14 साल के थे तभी कैंसर से उनकी मां का निधन हो गया था.

जॉन लेनन 17 साल के थे जब एक सड़क हादसे में उनकी मां की मृत्यु हो गई.

रिचर्ड स्टार्के (रिंगो स्टार) को कोई शोक नहीं हुआ, लेकिन उनको भी बड़ा सदमा झेलना पड़ा था. उनके बचपन में ही माता-पिता का तलाक हो गया था.

मां ने उनको गरीबी में पाला. जब वह 6 साल के थे तब वह बुरी तरह बीमार पड़ गए थे और एक साल तक अस्पताल में भर्ती रहे थे.

स्टार्के अभी 79 साल के हैं और अपने ऑल-स्टार बैंड के साथ स्टेज पर परफॉर्म भी करते हैं.

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झटके से उपलब्धियों तक

ये हर लिहाज से चरम उदाहरण हैं, लेकिन आम तौर पर हम इस बात को नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि कोई झटका किस हद तक इंसान को बड़ी उपलब्धियां हासिल करने के लिए आगे बढ़ाता है.

कुछ लोग झटके से उपजे सदमे और गुस्से को दृढ़ इच्छाशक्ति में बदल लेते हैं. पीछे खींचने वाली ताक़तों से संघर्ष करके वह एंटी-ग्रैविटी ताक़त हासिल कर लेते हैं जो उन्हें बाद में और ऊंचा ले जाती है.

यह सिद्धांत जीव विज्ञान के सिद्धांत जैसा है. भारोत्तोलक जानते हैं कि मांसपेशियों को विकसित करने के लिए पहले उनको आघात सहना होगा.

कसरत से उनकी मांसपेशियों में हजारों छोटी-छोटी चोटें आती हैं, जिनको उनका शरीर भर लेता है. इस तरह मांसपेशियां ताक़तवर होती जाती हैं.

जिम की तरह ज़िंदगी में भी, आप झटके को किस तरह लेते हैं, इससे तय होता है कि आगे चलकर इसका फायदा मिलेगा या नहीं.

ऊंची उपलब्धियां हासिल करने वाले लोग नुकसान और निराशा को प्रेरणा में बदलना जानते हैं.

इसका दूसरा पहलू यह है कि जिन लोगों की सभी ज़रूरतें आसानी से पूरी होती रहती हैं और जो इसी तरह बड़े होते हैं, उनमें प्रौढ़ता नहीं आती.

इसीलिए प्रतिभा विकास के कुछ विशेषज्ञ चिंतित रहते हैं कि बच्चों को झटके सहने या असफल होने का मौका भी नहीं दिया जा रहा है.

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असफलता ज़रूरी है

2012 के रिसर्च पेपर "दि रॉकी रोड टू दि टॉप : व्हाई टैलेंट नीड्स ट्रॉमा" में खेल वैज्ञानिकों- डेव कॉलिन्स और ऐने मैकनामरा ने खेलों में प्रतिभा विकास व्यवस्थाओं की आलोचना की है, जिनमें युवा एथलीटों को अधिक से अधिक समर्थन देकर उन्हें तनाव से दूर रखने पर जोर दिया जाता है.

दोनों लेखकों का तर्क है कि पैसे और नई तकनीक पर आधारित कोचिंग सिस्टम युवा खिलाड़ियों के जीवन को बहुत आसान बना रहे हैं, जबकि उनमें लड़कर वापसी करने की क्षमता विकसित करने के लिए चुनौतियों या आघात की ज़रूरत होती है.

महानता के लिए उबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरना पड़ता पड़ता है, सपाट सड़क से नहीं.

बेशक, इन सब बातों को मन में रखते हुए भी झटकों और नाकामियों को लेकर हमें ज़्यादा रोमांटिक नहीं होना चाहिए.

वे दर्दनाक और परेशान करने वाले हो सकते हैं.

कभी-कभी कोई बुरा अनुभव बस बुरा ही होता है. ख़ुद के साथ ऐसा होने पर ही इसका आभास होता है.

जब आप हार या निराशा के उन अंधेरे क्षणों में होते हैं तभी ख़ुद से पूछिए कि क्या एक दिन आप इसे कुछ अच्छे में बदल सकते हैं.

शायद (जर्मन दार्शनिक) फ्रेडरिक नीत्शे ने सही कहा था- जो हमें मार नहीं सकता वह हमें और मज़बूत बनाता है.

Ref https://www.bbc.com/hindi/vert-cap-49039565

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Dr. Popat Sonawane - Orthopaedic Surgeon, ghodnadi-shirur

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