भृंगराज स्वरस दूर करे कई बीमारियां

गुण और उपयोग– यह वटी शुक्रक्षयजनित समस्त प्रकार के विकारोंका, शीघ्रपतन का तथा वीर्य का पतलापन व प्रमेह का नाश करती है। अति मैथुनजनित शिथिलता वीर्य की क्षीणता, समस्त प्रकार के मूत्ररोग, कास–श्वास, कफज व वातज विकारों को भी शीघ्रातिशीघ्र नाश करने में यह वटी अति उत्तम है। यह वटी वीर्यवाही नाड़ियों और वातवाही नाड़ियों साथ–साथ ही ह्य्दय, मस्तिष्क व फुफ्फुसों पर भी अपना शीघ्र व विशेष प्रभाव दिखलाती है। यह वटी वीर्यवर्धक, अत्यन्त वृष्य व उत्तम रसायन है। कुछ समय तक निरन्तर सेवन करने से यह वटी समस्त धातुओं की पुष्टि कर शरीर को बलवान बनाकर पुष्टि व कान्ति प्रदान करती है। समस्त वात रोगों पर यह विशेष का Read More : भृंगराज स्वरस दूर करे कई बीमारियां about भृंगराज स्वरस दूर करे कई बीमारियां

गन्धक वटी – आयुर्वेद की भेंट

क्र.सं. घटक द्रव्य प्रयोज्यांग अनुपात

रस (शुद्ध पारद) (Mercury) 24 ग्राम
गन्धक शुद्ध (Sulphur) 48 ग्राम
शुण्ठी (Zingiber officinale Rosc.) कन्द 48 ग्राम
लवङ्ग (Syzygium aromaticum Linn.Merr. & Per.) पुष्प 48 ग्राम
मरिच (Piper nigrum Linn.) फल 48 ग्राम
सैंधव लवण 144 ग्राम
सौवर्चल लवण (काला नमक Rock salt) 144 ग्राम
चणकाम्ल पत्र 96 ग्राम
मूलक क्षार पंचांग 96 ग्राम
निम्बजल (Azadirachta indica A. Juss.) फल Q.S मर्दनार्थ
मात्रा– 2 ग्राम

अनुपान– नीबू शर्बत, कोष्ण जल Read More : गन्धक वटी – आयुर्वेद की भेंट about गन्धक वटी – आयुर्वेद की भेंट

गुणों से भरपूर है द्राक्षादि गुटिका

.सं. घटक द्रव्य प्रयोज्यांग अनुपात

द्राक्षा (Vitis vinifera Linn.) शुष्क फल 1 भाग
पथ्या (हरीतकी) (Terminalia chebula Retz.) फल मज्जा 1 भाग
सिता (इक्षु) (Saccharum offici narum Linn.) 2 भाग
मात्रा– 6-12 ग्राम

गुण और उपयोग– यह वटी पित्त और वात को शान्त करती है। पित्त के कारण होने वाले रोग जैसे अम्लपित्त, गले और छाती में जलन, अधिक प्यास लगना, बेहोशी, चक्कर आना को ठीक करता है। यह आमवात रोग में फायदा करता है। कब्ज के रोगियों के लिए यह उत्तम औषधि है। रात में सोने से पहले चार गोली दूध के साथ सेवन करने से सुबह दस्त होकर कब्ज से राहत मिलती है Read More : गुणों से भरपूर है द्राक्षादि गुटिका about गुणों से भरपूर है द्राक्षादि गुटिका

गुणों से भरपूर है धान्वन्तर गुटिका

एला (सूक्ष्मैला) (Elettaria cardmomum Maton.) बीज 1 भाग
विश्वा (शुण्ठ) (Zingiber officinale Rosc.) कन्द 1 भाग
अभया (हरीतकी) (Terminalia chebula Retz.) फली 1 भाग
जाती (जातीफल) (Myristica fragrans Houtt.) बीज 1 भाग
बृहती (Solanum indicum Linn.) पंचांग 1 भाग
आर्य (चन्द्रिका) (Lepidium sativum Linn.) बीज 1 भाग
जीरक (श्वेतजीरक) (Cuminum cyminum Linn.) फल 1 भाग
कंकोल (Piper cubaba Linn.) बीज 1 भाग
भूनिम्ब (किराततिक्त ) (Swertia chirayita (Roxb.ex.Flem.)पंचांग 1 भाग
रुद्राक्ष बीज 1 भाग
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प्राणदा गुटिका – आयुर्वेद की भेंट

त्रिपलं शृंगवेरस्य चतुर्थं मरिचस्य च।

पिप्पल्याः कुडवार्धञ्च चव्यञ्च पलमेव च।।

तालीशपत्रस्य पलं पलाद्ध्र्रं केशरस्य च।

द्वे पले पिप्पली मूलादर्द्ध कर्षञ्च पत्रकात्।।

सूक्ष्मैला कर्षमेकञ्च कर्षं त्वगमृणालयोः।

गुडात्पलानि त्रिंशच्च चूर्णमेकत्र कारयेत्।। भै.र., अर्शोरोगाधिकार

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ब्राह्मी वटी स्वर्णघटित – एक नाम, कई लाभ-

क्र.सं. घटक द्रव्य प्रयोज्यांग अनुपात

अभ्रक भस्म
संगेयशव भस्म/पिष्टी
अकीकभस्म/पिष्टी
माणिक्य भस्म/पिष्टी
मात्रा– 2-4 ग्राम Read More : ब्राह्मी वटी स्वर्णघटित – एक नाम, कई लाभ- about ब्राह्मी वटी स्वर्णघटित – एक नाम, कई लाभ-

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Dr. Popat Sonawane - Orthopaedic Surgeon, ghodnadi-shirur

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