राग परिचय

आविर्भाव-तिरोभाव

आविर्भाव का अर्थ, तिरोभाव का अर्थ, आविर्भाव का पर्यायवाची

आविर्भाव व तिरोभाव भारतीय संगीत में अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। किसी भी राग के स्वरों को ऐसे क्रम में लगाना, जिससे किसी दूसरे राग की छाया दृष्टिगोचर होने लगे उसे तिरोभाव कहते हैं। परन्तु राग के मार्मिक स्वर पुन: लगाकर राग का आविर्भाव किया जाता है जिससे रागरूप स्पष्ट अपने रूप में आ जाए, आविर्भाव कहलाता है।
आविर्भाव-तिरोभाव बहुत कलापूर्ण है और अनुभवी, राग विज्ञान के दक्ष लोगों द्वारा ही संभव है अन्यथा इसमें राग स्वरूप नष्ट होने की अधिक संभावना रहती है।

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रागांग वर्गीकरण पद्धति एवं प्रमुख रागांग

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प्रमुख रागों में ऐसे स्वर समूह होते है जिनसे उनकी स्वतंत्र छवि बनती है। ऐसे ही स्वतंत्र छवि बनाने वाले स्वर समूह को रागांग कहते है तथा स्वतंत्र अंग वाले राग, रागांग प्रमुख राग माने जाते हैं। ऐसे रागों में विस्तार की विस्तृत संभावनायें रहती है। आधुनिक काल में हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति में रागांग वर्गीकरण पद्धति को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इसी पद्धति एवं प्रमुख रागांग आदि का विश्लेषण इस लेख में प्रस्तुत किया गया है।
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राग दरबारी कान्हड़ा

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राग दरबारी कान्हड़ा

प्राचीन संगीत ग्रन्थों मे राग दरबारी कान्हड़ा के लिये भिन्न नामों का उल्लेख मिलता है। कुछ ग्रन्थों मे इसका नाम कणार्ट, कुछ मे कणार्टकी तो अन्य ग्रन्थों मे कणार्ट गौड़ उपलब्ध है। वस्तुत: कन्हण शब्द कणार्ट शब्द का ही अपभ्रंश रूप है। कान्हड़ा के पूर्व दरबारी शब्द का प्रयोग मुगल शासन के समय से प्रचलित हुआ ऐसा माना जाता है। कान्हड़ा के कुल कुल 18 प्रकार माने जाते हैं- Read More : राग दरबारी कान्हड़ा about राग दरबारी कान्हड़ा

मोहम्मद रफ़ी जी के कुछ बेहतरीन गानों की लिस्ट

रफ़ी
  • ओ दुनिया के रखवाले (बैजू बावरा-1952)
  • AJJ MAUSAM BADA BAIMAN HAI
  • ये है बॉम्बे मेरी जान (सी आई डी, 1957), हास्य गीत
  • सर जो तेरा चकराए, (प्यासा - 1957), हास्य गीत
  • हम किसी से कम नहीं* चाहे कोई मुझे जंगली कहे, (जंगली, 1961)
  • मैं जट यमला पगला
  • चढ़ती जवानी मेरी
  • हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं, (गुमनाम, 1966), हास्यगीत
  • राज की बात कह दूं
  • ये है इश्क-इश्क
  • परदा है परदा
  • ओ दुनिया के रखवाले - भक्ति गीत
  • हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के, (फिल्म-जागृति, 1954), देशभक्ति गीत

राग बिलावल

  1. इस राग में सात स्वर लगते हैं।
  2. इस राग में सब स्वर शुद्ध लगते हैं।
  3. इस राग का वादी स्वर "ध" है।
  4. इस राग का संवादी स्वर "ग" है।
  5. इस राग के गाने बजाने का समय प्रातःकाल है है।
  6. आरोही = स रे ग म प ध नी सं

अवरोही = सं नी ध प म ग रे स

पकड़ = सं नी ध प, म ग, रे स

 

राग बिलावल

(ताल सरगम तीन ताल)

स्थाई Read More : राग बिलावल about राग बिलावल

राग ललित!

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राग: 

अपने मित्रों को मैं यह कोई नई बात नहीं बता रहा कि मुझे भारतीय शास्त्रीय संगीत से लगाव है। संगीत की जानकारी में मैं बिल्कुल शून्य हूँ लेकिन हाँ उसे मन से महसूस करके उसका आनंद लेना मुझे आता है। बचपन से ही हिन्दी फ़िल्मों के शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीतों ने अधिकांश लोगों की तरह मेरे मन को भी मगन किया है। आज शीला और मुन्नी के दौर में इन्हीं शास्त्रीय गीतों के आधार पर बॉलीवुड में संगीत का नाम जीवित है। Read More : राग ललित! about राग ललित!

राग खमाज का परिचय

राग खमाज
राग: 

भारतीय संगीत पद्धति के दस थाटों में से एक खमाज राग भी है. इसका वादी स्वर गांधार और संवादी निषाद है, आरोह में ऋषभ वर्जित है. निषाद शुद्ध, अवरोह कोमल और अन्य सभी शुद्ध स्वर लगते हैं. यह राग शृंगारप्रधान है. अत: इसके गाने का समय रात्रि का दूसरा पहर बताया गया है. इसका व्याकरण देखें तो इस राग की उत्पत्ति खमाज थाट से ही मानी गई है, यानी ये अपने थाट का आश्रय राग है.

यह राग शृंगारप्रधान है. अत: इसके गाने का समय रात्रि का दूसरा पहर बताया गया है. इसका व्याकरण देखें तो इस राग की उत्पत्ति खमाज थाट से ही मानी गई है, यानी ये अपने थाट का आश्रय राग है. Read More : राग खमाज का परिचय about राग खमाज का परिचय

राग यमन (कल्याण)

राग यमन
राग: 

इस राग को राग कल्याण के नाम से भी जाना जाता है। इस राग की उत्पत्ति कल्याण थाट से होती है अत: इसे आश्रय राग भी कहा जाता है। जब किसी राग की उत्पत्ति उसी नाम के थाट से हो तो उसे कल्याण राग कहा जाता है। इस राग की विशेषता है कि इसमें तीव्र मध्यम और अन्य स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। ग वादी और नि सम्वादी माना जाता है। इस राग को रात्रि के प्रथम प्रहर या संध्या समय गाया-बजाया जाता है। इसके आरोह और अवरोह दोनों में सातों स्वर प्रयुक्त होते हैं, इसलिये इसकी जाति सम्पूर्ण है। Read More : राग यमन (कल्याण) about राग यमन (कल्याण)

संगीत में बड़ी ताक़त है - सलीम-सुलेमान

संगीत में बड़ी ताक़त है

मशहूर संगीतकार जोड़ी सलीम-सुलेमान का कहना है कि संगीत उनके जीवन का अहम हिस्सा है और वो इसके ज़रिए ही ज़िदगी के अलग अलग पहलुओं को लोगों तक पहुँचाने की कोशिश करते रहे हैं.

प्रियंका चोपड़ा और उदय चोपड़ा के अभिनय से सजी हाल ही में प्रदर्शित फ़िल्म 'प्यार इंपासिबल' में इस जोड़ी ने संगीत दिया है.

सलीम सुलेमान की जोड़ी ने बॉलीवुड को बेहतरीन संगीत से सजी कई फ़िल्में दी हैं.जिनमें ‘चक दे इंडिया’, ‘रब ने बना दी जोड़ी’, ‘आजा नच ले’, ‘रॉकेट सिंह-सेल्समैन ऑफ द इयर’ और ‘क़ुर्बान’ शामिल हैं.

हाल ही में उन्होंने बीबीसी से लंबी बातचीत की. Read More : संगीत में बड़ी ताक़त है - सलीम-सुलेमान about संगीत में बड़ी ताक़त है - सलीम-सुलेमान

राग 'भैरव':रूह को जगाता भोर का राग

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राग भैरव की उत्पत्ति भैरव थाट से  है. इसमें रे और ध कोमल लगते हैं, बाकी स्वर शुद्ध लगते हैं. कोमल रे और ध को आंदोलित किया जाता है.
ये भोर का राग है, सुबह 4 बजे से 7 बजे तक इसे गाया-बजाया जाता है. सुबह का रियाज़ ज़्यादातर संगीतकार भैरव में ही करते हैं. आरोह और अवरोह में सातों स्वर लगते हैं इसलिए इस राग की जाति है संपूर्ण.
आरोह- सा रे ग म प ध नि सां
अवरोह- सां नि ध प म ग रे सा
पकड़- ग म ध s ध s प, ग म रे s रे सा

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Dr. Popat Sonawane - Orthopaedic Surgeon, ghodnadi-shirur

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