ओशो – एकाग्रता का महत्व

ओशो – एकाग्रता का महत्व

यह जो संगीत के खंड तुम भीतर इकट्ठे कर लोगे, इनको खंडों की भांति इकट्ठा मत करना, इनके बीच संबंध भी खोजना।

कठिन है। और जीवन की कला चाहिए। बचपन में तितली के साथ दौड़ कर एक सुख मिला था, वह तुम्हारे भीतर पड़ा है। फिर पहली बार तुम किसी के प्रेम में गिर गए थे, और तब तुमने एक आनंद का अतिरेक अपने में अनुभव किया था, वह भी तुम्हारे भीतर पड़ा है। और तब किसी एक रात सागर के किनारे बैठ कर सागर के गर्जन में तुम डूब गए थे, वह भी तुम्हारे भीतर पड़ा है। और कभी अकारण ही, खाली तुम बैठे थे और अचानक तुमने पाया कि सब मौन और शांत हो गया, वह भी तुम्हारे भीतर पड़ा है। ऐसे दस—पांच अनुभव तुम्हारे भीतर पड़े हैं। ये टुकडे—टुकड़े हैं। इनमें तुमने कभी यह खोजने की कोशिश नहीं की है कि इन सबके भीतर कामन एलिमेन्ट क्या है? इन सबके भीतर सम—स्वरता कहां है?

तितली के पीछे दौड़ता हुआ बच्चा और अपनी प्रेयसी के पास बैठा हुआ युवक—इन दोनों के बीच क्या मेल है? दोनों से सुख मिला है, और दोनों से एक संगीत का अनुभव हुआ है, और दोनों के बीच आनंद की कोई झलक थी, तो जरूर दोनों के बीच कोई तत्व समान होना चाहिए। बात बिलकुल भिन्न है। तितली के पीछे दौड़ता हुआ बच्चा, अपनी प्रेयसी के पास बैठा हुआ जवान, ओं का पाठ करता हुआ का, कहीं इनमें कोई तालमेल ऊपर से नहीं दिखता; लेकिन भीतर जरूर कोई घटना समान है। क्योंकि तीनों कहते हैं, बड़ा आनंद है। वे स्वाद जरूर समान हैं, भोजन कितने ही भिन्न हों।

तो जरा खोजना कि तितली के पीछे दौड़ते हुए बच्चे को जो सुख मिला था, वह क्या था? एकाग्रता थी, तितली ही रह गई थी। सारा जगत भूल गया था। बच्चा दौड़ रहा है उसके पीछे, यह भी उसे पता नहीं था। दौड़ने के साथ एक हो गया था। उसकी आंखें तितली पर बंध गई थीं। चित्त में सारे विचार खो गए थे, क्योंकि तितली पकड़नी थी, उतना ही विचार था। वह भी विचार था, ऐसा कहना कठिन है। एक भाव था। उस भाव—एकाग्रता के कारण सुख का अनुभव हुआ था।

फिर जवान हो गया था वही बच्चा जो तितली पकड़ रहा था, फिर वह अपनी प्रेयसी के पास बैठा है एक तारों भरी रात में। तितली और प्रेयसी में कोई संबंध नहीं है। लेकिन इस प्रेयसी के पास बैठ कर वह पुन: एकाग्र हो गया है। बस एक ही भाव रह गया, जगत मिट गया है, यह प्रेयसी ही रह गई है। अब कोई मन में उसके विचार नहीं है। इस प्रेयसी की मौजूदगी में वह उसी को पीता है। अब कोई दूसरा भाव, कोई दूसरा विचार उसको नहीं पकड़ता। इस क्षण में वह पुन: भाव—एकाग्रता में डूब गया है।
***साधना सूत्र , प्रवचन # 12

                                      **** ओशो

 
 
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