वर्मीवाश एक तरल जैविक खाद

वर्मीवाश एक तरल जैविक खाद

यदि हमारी खेती प्रमाणिक तौर पर 100 फीसदी जैविक हो जाये, तो क्या हो? यह सोचते ही मेरे मन में सबसे पहले जो कोलाज उभरता है, उसमें स्वाद भी है, गन्ध भी, सुगन्ध भी तथा इंसान, जानवर और खुद खेती की बेहतर होती सेहत भी। इस चित्र के लिये एक टैगलाइन भी लिखी है - “अब खेती और किसान पर कोई तोहमत न लगाए कि मिट्टी, भूजल और नदी को प्रदूषित करने में उनका भी योगदान है।’’

अभी यह सिर्फ एक कागजी कोलाज है। जमीन पर पूरी तरह कब उतरेगा, पता नहीं। किन्तु यह सम्भव है। सिक्किम ने इस बात का भरोसा दिला दिया है। उसने पहल कर दी है। जब भारत का कोई राज्य अपने किसी एक मण्डल को सौ फीसदी जैविक कृषि क्षेत्र घोषित करने की स्थिति में नहीं है, ऐसे में कोई राज्य 100 फीसदी जैविक कृषि राज्य होने का दावा करे; यह बात हजम नहीं होती। लेकिन दावा प्रमाणिक है, तो शक करने का कोई विशेष कारण भी नहीं बनता।
वर्मीवाश इकाई 
लगभग 16 दिन बाद, जब इकाई तैयार हो जाए, नल को बंद करके पांच लीटर क्षमता का एक बर्तन, जिसमें नीचे बारीक सुराख हों, इकाई के ऊपर लटका दें। ताकि बूंद-बूंद पानी नीचे गिरे। यह पानी धीरे-धीरे कम्पोस्ट के माध्यम से गुजरता है और ताजा वर्मीकम्पोस्ट से तत्व लेकर अपने साथ घोल लेता है। साथ ही केंचुओं के शरीर को धोकर भी पानी गुजरता है। नल को अगले दिन वर्मीवाश एकत्रित करने के लिये खोल लिया जाए। इसके बाद नल को बंद कर दिया जाए तथा ऊपर वाले बर्तन में पानी भर दिया जाए ताकि उसी प्रकार वर्मीवाश एकत्रित करने की प्रक्रिया चलती रहे। इकाई को ऊपर से बोरी से ढककर रखना चाहिये।

इकाई के ऊपरी सतह पर एकत्रित वर्मीकम्पोस्ट को समय-समय पर बाहर निकाला जा सकता है तथा गोबर व अवशेष डाले जा सकते हैं। या जब तक पूरा बैरल भर न जाए इसी प्रकार ऊपर फसल अवशेष डालते रहें तथा उसके बाद कम्पोस्ट को निकालकर दोबारा से सामग्री भरें। वर्मीवाश को इसी स्वरूप में स्टोर किया जा सकता है या धूप में सांद्रीकरण करके स्टोर कर सकते हैं। प्रयोग के समय इसमें पानी मिलाया जा सकता है। जो प्रयोगकर्ता की जरूरतों के अनुसार हो सकता है। इक्रीसेट, हैदराबाद में डॉ. ओ.पी. रूपेला द्वारा अपनायी जा रही वर्मीवाश विधि उपरोक्त विधि का ही एक प्रारूप है। इसमें फिल्टर के रूप में एक बदलाव किया गया है। एक गोलाकार चौड़ा सीमेंट का पाईप एक प्लेटफार्म पर रख्रकर सीमेंट से जोड़ें। इसके ऊपर एक और सीमेंट का पाईप रखें। दोनों के बीच एक मोटी लोहे की जाली रखें तथा सीमेंट से जोड़ें। नीचे वाले पाईप के साईड में नीचे एक नल लगायें। लोहे की जाली के ऊपर प्लास्टिक की जाली रूपी फिल्टर बिछायें जिसके किनारे बैरल से बाहर निकले हों। फिल्टर के ऊपर गोबर डालें व केंचुए डाल दें। इसके ऊपर फसल अवशेष/पत्तियों आदि की 3-4 इंच मोटी परत बिछायें। यह अवशेष उसी रूप में या 2 प्रतिशत गोबर की स्लरी से भिगोकर डाल सकते हैं। प्रति सप्ताह इसी प्रकार अवशेष की परत बिछाते रहें। समय-समय पर पानी छिड़कते रहें। उचित तापमान बनाकर रखें। ऊपर से पाईप को एक पोटली, जिसमें पत्ते/पराली भरे हों, से ढक देना चाहिये ताकि नमी बरकरार रहे तथा अंधेरा भी रहे।

लगभग एक माह बाद जब अच्छी वर्मीकम्पोस्ट बनने लग जाए तो वर्मीवाश लेना शुरू कर सकते हैं। ऊपर फब्बारे के रूप में धीरे-धीरे पानी डालें जो कि इकाई से गुजरता हुआ नीचे निकलेगा। चूंकि इकाई का निचला आधा हिस्सा खाली है अत: फिल्टर के माध्यम से पानी नीचे चला जाएगा। दिन में लगभग 10 लीटर पानी यूनिट से बाहर निकालें। इस वर्मीवाश की सांद्रता बढ़ाने के लिये इसे दोबारा से इकाई के माध्यम से गुजारें। इस प्रकार 4-5 चक्रों के बाद सुनहरे रंग का वर्मीवाश तैयार हो जाता है।

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Dr. Popat Sonawane - Orthopaedic Surgeon, ghodnadi-shirur

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