केले की खेती

केले की खेती

जलवायु-भूमि

केला की खेती के लिए गर्मतर एवं समजलवायु उत्तम होती है अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में केले की खेती सफल रहती है। जीवंशयुक्त दोमट, मटियार दोमट भूमि, जिससे जल निकास उत्तम हो, उपयुक्त मानी जाती है।

खेती की तैयारी 

समतल खेत को चार-पांच गहरी जुताई करके भुरभुरा बना लेना चाहिए। खेत की तैयारी करने के बाद समतल खेत में लाइनों में गड्ढे तैयार करके रोपाई की जाती है। केले की रोपाई के लिए खेत की तैयारी के बाद लाइनों में गड्ढे 1.5 मीटर लम्बे, 1.5 मीटर चौड़े गहरा खोद कर छोड़ दें, जिससे धूप लग जाए। 

पौधरोपण 

पौधों की रोपई में तीन माह की तलवारनुमा पुतियां जिनमें घनकन्द पूर्ण विकसित हो, का प्रयोग किया जाता है, इन पुतियों की पत्तियां काटकर रोपाई करनी चाहिए। रोपाई के बाद पानी लगाना आवश्यक है। 

कीट प्रबंधन

केले में कई कीट लगते हैं जैसे केले का पत्ती बीटल, तना बीटल आदि। नियंत्रण के लिए मिथाइल ओ-डीमेटान 25 ईसी 1.25 मिली प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

वैज्ञानिक सलाह

‘केंद्रीय उपोष्ण बागवानी अनुसंधान संस्थान’ के डॉ रामकुमार ने केले के पौधों की रोपाई का समय व उनमें लगने वाले रोगों के बारे में जानकारी दी। 

उन्होंने बताया, ‘‘जिन पुतियों में चार से छह पत्तियां हों और लम्बाई करीब छह से नौ इंच के बीच हो उन पुतियों की रोपाई करानी चाहिए। 

केले के पौधों की रोपाई एक जुलाई से 20 जुलाई के बीच करना सबसे सही रहता है, क्योंकि इसके बाद रोपाई करने से पैदावर कम हो सकती है।’’ वो आगे बताते हैं, ‘‘उत्तर प्रदेश के केला किसानों के लिए ‘ग्राण्ड-9’ किस्म सबसे सही होती है।’’

जल प्रबंधन

ग्रीष्म ऋतु में आवश्यकतानुसार सात से दस दिन पर तथा अक्टूबर-फरवरी के शीतकाल में 12 से 15 दिन पर सिंचाई करते रहना चाहिए। मार्च से जून तक केले के थालों पर पुआल, गन्ने की पत्ती अथवा पॉलीथीन आदि बिछा देने से नमी सुरक्षित रहती है, सिंचाई की मात्रा भी आधी रह जाती है साथ ही फलोत्पादन एवं गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

खर-पतवार प्रबंधन

केले की फसल के खेत को स्वच्छ रखने के लिए आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए। इससे पौधों को हवा एवं धूप आदि मिलती रहती है, जिससे फसल स्वस्थ रहती है और फल अच्छे आते हैं।

रोग प्रबंधन

केले की फसल में कई रोग कवक व विषाणु के द्वारा लगते हैं जैसे पर्णचित्ती या लीफ स्पॉट, गुच्छा शीर्ष या बन्ची टॉप, एन्थक्नोेज एवं तनागलन हर्टराट आदि। नियंत्रण के लिए ताम्रयुक्त रासायन जैसे कॉपर आक्सीक्लोराइट 0.3 प्रतिशत का छिड़काव करना चाहिए या मोनोक्रोटोफॉस 1.25 मिली लीटर प्रति लीटर पानी के साथ छिड़काव करना चाहिए।

पोषण प्रबंधन

केले की खेती में भूमि की ऊर्वरता के अनुसार प्रति पौधा 300 ग्राम नत्रजन, 100 ग्राम फॉस्फोरस तथा 300 ग्राम पोटाश की आवश्यकता पड़ती है। फॉस्फोरस की आधी मात्रा पौधरोपण के समय तथा शेष आधी मात्रा रोपाई के बाद देनी चाहिए। नत्रजन की पूरी मात्रा पांच भागों में बांटकर अगस्त, सितम्बर, अक्टूबर तथा फरवरी एवं अप्रैल में देनी चाहिए।

  • =एक हेक्टेयर में करीब 3,700 पुतियों की रोपाई करनी चाहिए।
  • =केले के बगल में निकलने वाली पुतियों को हटाते रहें।
  • =बरसात के दिनों में पेड़ों के अगल-बगल मिट्टी चढ़ाते रहें।
  • =सितम्बर महीने में विगलन रोग तथा अक्टूबर महीने में छीग टोका रोग के बचाव के लिए प्रोपोकोनेजॉल दवाई 1.5 एमएल प्रति लीटर पानी के हिसाब से पौधों पर छिड़काव करें।
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Dr. Popat Sonawane - Orthopaedic Surgeon, ghodnadi-shirur

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