अनारदाना की खेती कैसे करे

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अनार की खेती भारत की एक मुख्य फलदार फसल है| अनार की खेती भारत के महाराष्ट्र, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, आंद्रप्रदेश, पंजाब, कर्नाटका, गुजरात और मध्यप्रदेश आदि राज्यों में मुख्य रूप से की जाती है|इसका पौधा 3 से 4 साल में फल देना शुरू कर देता है| अनार का वृक्ष 20 से 25 साल तक फल देता है| भारत में अनार का क्षेत्रफल करीब 115 हजार हेक्टेयर है, और उत्पादन करीब 750 हजार मैट्रिक टन है| वर्तमान में अनार की खेती और उत्पादन क्षमता में तेजी से विस्तार हो रहा है|

अनार पौष्टिक गुणों से परिपूर्ण,स्वादिष्ट रसीला एवं मीठा फल होता है| अनार का रस स्वास्थ्यवर्धक तथा स्फूर्तिदायक और अनेक रोगों से छुटकारा दिलाने वाला होता है| इसके फलों के छिलकों से पेट की बिमारियों की दवाईयां तैयार की जाती है| इसके दानों को धूप में सुखाकर अनारदाना भी बना सकते है, जिसका उपयोग विभिन्न व्यंजन बनाने में किया जाता है|

 

किसान भाई कुछ विशेष बातों को ध्यान में रखकर अनार की खेती से अच्छी उपज और मुनाफा प्राप्त कर सकते है| वो विशेष बातें क्या है, अनार की खेती कैसे करें, जानिए उपयुक्त जलवायु, किस्में, रोग रोकथाम, पैदावार आदि की विधियों पर आपको विशेष ध्यान देना होगा जिससे आप अनार से उन्नत पैदावर प्राप्त कर सकते है| तो आइए जानिए-

अनार की खेती हेतु जलवायु
अनार की खेती के लिए शुष्क और अर्द्ध शुष्क क्षेत्र की जलवायु (सर्दी में सामान्य ठंडक और गर्मियों में गर्म) अनार की खेती के लिये अति उपयुक्त हैं| फलों की वृद्धि तथा पकने के समय 40 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान (गर्म और शुष्क जलवायु) उपयुक्त रहता हैं| 11 डिग्री सेतिग्रेट से कम तापमान का पौधों की वृद्धि पर बुरा प्रभाव पड़ता हैं| पूर्ण विकसित फलों में रंग,दानों रंग व मिठास लिये अपेक्षाकृत कम तापमान आवश्यकता होती हैं| वातावरण, मृदा में नमी एवं तापमान में अत्यधिक उतार-चढ़ाव से फलों के फटने की समस्या बढ़ जाती हैं, जिससे उनकी गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव पड़ता हैं|

 

उपयुक्त भूमि

अनार की खेती सभी प्रकार की भूमि में की जा सकती है| अनार के पौधें में लवण एवं क्षारीयता सहन करने की अद्भुत क्षमता होती हैं| जिसके लिए मृदा का पी एच मान 6.5 से 7.5 अच्छा माना जाता हैं| लेकिन इसको 8.0 पी एच मान वाली भूमि में भी उगाया जा सकता है| अनार की खेती के लिये उचित जल निकास वाली, गहरी बलुई दोमट भूमि सबसे अच्छी मानी जाती हैं| परन्तु क्षारीय भूमि व लवणीय भूमि में भी अनार की अच्छी पैदावार ली जा सकती हैं|

प्रमुख किस्में
यहां निचे कुछ प्रमुख उन्नतशील और संकर किस्मों का विवरण निम्नलिखित है, जैसे की-

भगवा- यह किस्म महात्मा फूले कृषि विश्वविध्यापीठ, राहुरी महाराष्ट्र, में विकसित की गई है| यह किस्म सिंदुरी या केशर के नाम से भी जानी जाती है| इस किस्म के फल के छिलके और दाने का रंग भगवा है| फल के छिलके मोटे, फल मध्यम से थोड़े बड़े, दाने चबाने में थोड़े कडक होते है| फल के छिलके मोटे होने से निर्यात व लंबे अंतर की मंडी के लिए योग्य किस्म है| इसके फल का औसतन 300 से 400 ग्राम के होते है| इसके फल 180 से 190 दिनो में तैयार हो जाते है| प्रति पौधा औसत उपज 30 किलोग्राम मिलती है| ज्यादा अच्छी देखभाल करें, तो प्रति पौधा 40 किलोग्राम तक उपज मिलती है|

गणेश- यह महाराष्ट्र कि मशहूर किस्म है| इसके फल बड़े 400 से 500 ग्राम, छिलके का रंग गुलाबी पीला, दाने आकर्षक, नरम रसीले और गुलाबी रंग के होते है| यह किस्म अधिक गर्मी सहन नहीं कर सकती, ज्यादा गर्मी में दानो का रंग सही न रहकर अंदर के दाने काले होकर सड़ जाते है| प्रति पौधा औसत 8 से 10 किलोग्राम उपज मिलती है|

फूले अर्कता- यह किस्म महात्मा फूले कृषि विश्वविध्यापीठ, राहुरी महाराष्ट्र, में विकसित की गई है| इस किस्म के फल के छिलके चमकते गहरे लाल, फल बड़े कद के, मीठे, बीज नरम और गहरे लाल रंग के होते है|

मसकित- इसके फल छोटे मध्यम आकार के तथा फलो का छिलका मोटा होता है| इसका रस मीठा और बिज मुलायम होते है| यह व्यवसायिक दृष्टि से अच्छी किस्म है|

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ढोलका- इस किस्म की खेती अधिकतर गुजरात में होती है| इसमे फल अधिक लगते है इसके छिलके का रंग सफेद हरा लिए होता है| इसके दाने गुलाबी सफ़ेद होते है|

 
जालोर बेदाना- यह मुलायम बीजो वाली किस्म है| इसका विकास और अनुशंषा केन्द्रीय संसथान जोधपुर से शुष्क क्षेत्रो के लिए किया गया है| फल बड़े आकार के होते है, जिनका औसत वजन 200 ग्राम होता है| इसका छिलका लाल से गहरा लाल होता है|

रूबी- यह एक संकर किस्म है| जो कि भारतीय उद्यान अनुसन्धान संसथान बंगलोर से विकसित कि गयी है| इसके बिज मुलायम अधिक मिठास वाले होते है|

मृदुला- यह किस्म महात्मा फूले कृषि विश्वविध्यापीठ, राहुरी महाराष्ट्र, में विकसित की गई है| यह संकर किस्म है| यह किस्म गणेश और गुल ए शाह रेड के संकरण से बनाई गई है| इस किस्म के छिलके मध्यम आकार के, नरम और गहरे लाल रंग के है| दाने गहरे लाल रंग के, रसीले और स्वाद में मीठे होते है| ज्यादा पानी लेने वाली किस्म है|

ज्योति- यह किस्म बेसिन और ढोलका के संकरण से निकाली गयी किस्म है| यह कोयल बिज वाली तथा अधिक उपज देने वाली किस्म है

बेसिन बेदाना- यह कर्णाटक कि उत्तम किस्म है| इसका बिज मुलायम होता है, तथा फल कम फटते है|

पेपर सेल- यह भी एक मुलायम बिज वाली अच्छी किस्म है|

शुष्क एवं अर्ध शुष्क जलवायु की किस्म- यहां हम किसान भाइयों को बताते चलें की जालोर सीडलेस, जी-137, पी- 23, मृदुला और भगवा आदि किस्में गर्म और शुष्क जलवायु के लिए सबसे उपयुक्त है हैं|

प्रसारण और प्रवर्धन
अनार की खेती हेतु अनार का प्रवर्धन, टुकड़े व गुंटी कलम से और टिश्यू कल्चर विधियों से होता है|

बीज द्वारा

भारत के अधिकतर पुराने अनार के बाग में बीजू पौधो से लगाए गए है| यही कारण है, की पौधो और उनके फलो में काफी भिन्नता पाई जाती है|

कलम द्वारा

इस विधि में तैयार किये हुए पौधे की उपज और फलों की गुणवत्ता में करीब करीब पौधे समान होते है|

कास्ठ कलम

यह विधि बहुत ही सस्ती और आसान है| बड़े हिस्से के बागबानी क्षेत्रो में इस विधि से पौधे तैयार किए जाते है| इस विधि से कलम तैयार करने हेतु फरवरी से अगस्त महीने तक का समय अनुकूल है|

गूटी कलम

यह विधि कास्ठ कलम से महंगी है, परंतु बड़े पौधे लेने के लिए यह विधि ज्यादा अच्छी है

टिश्यू कल्चर

टिश्यू कल्चर से तैयार किए पौधे अच्छी गुणवत्ता वाले व एक जैसे कद के होते है। इस लिए किसान भाई अपने नजदीक की एग्रीकल्चर युनिवर्सिटी में संपर्क करे, और जानकारी प्राप्त करें|

ध्यान दे- किसान भाई यदि स्वयं पौधे तैयार नही करते है, तो विश्वसनीय नर्सरी से ही पुरे तथ्यों के साथ पौधे लें, और रोपाई से 15 से 20 दिन पहले पौधे लेकर बागवानी वाली जगह रख ले, इससे पौधों को वहां के वातावरण से अवगत होने का समय मिल जाता है|

खेत की तैयारी व पौधा रोपण 
अनार की खेती हेतु गड्ढ़ा खोदने का कार्य मई माह में पूरा कर लेना चाहिये| जिस जगह पर अनार के बाग की बुवाई करनी है| वहां पर वर्गाकार या आयताकार विधि से 4 X 4 मीटर (625 पौधे प्रति हेक्टेयर) या 5 X 3 मीटर (666 पौधे प्रति एक हेक्टेयर) की दूरी पर, 60 X 60 X 60 सेंटीमीटर आकार के गड्डे खोदकर 15 से 30 दिन सूर्यप्रकाश में तपने दें|

उसके बाद ऊपरी स्तर की मिट्टी के साथ प्रति गड्ढा 10 किलोग्राम गोबर खाद 200 ग्राम डीऐपी और 200 ग्राम पोटाशयुक्त खाद व 100 ग्राम क्लोरपायरीफोस पाउडर ( दीमक नियंत्रण हेतु) डालके प्रति गड्ढे भर दे| गड्डों को ऊपर तक भर कर पानी डाल देना चाहिये जिससे मिट्टी अच्छी तरह बैठ जाये| पौध रोपण से एक दिन पहले 100 ग्राम नाइट्रोजन, 50 ग्राम फॉस्फोरस तथा 50 ग्राम पोटाश प्रति एक गड्डों के हिसाब से डालने से पौधों की स्थापना पर अनुकूल प्रभाव पड़ता हैं| पौध रोपण के लिये जुलाई से अगस्त का समय अच्छा रहता हैं, परन्तु पर्याप्त सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने पर फरवरी से मार्च में भी पौधे लगाये जा सकते हैं| प्रति गड्ढा एक कलमी पौधे की बुवाई करें| बुवाई के बाद बारिश न होतो पानी दे|

खाद और उर्वरक
अनार की खेती में पेड़ की आयु के हिसाब से ही खाद दे| गोबर खाद की पूरी मात्रा जून महीने में दें, और नाईट्रोजन की आधी मात्रा और फोस्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा सितंबर से अक्टूबर महीने में देना ही उपयुक्त माना जाता है, नाइट्रोजन की बची हुई मात्र आवश्यकतानुसार देनी चाहिए| निचे खाद और उर्वरक की मात्रा का उल्लेख है-

पौधे की आयु  गोबर खाद (किलोग्राम) नाइट्रोजन (ग्राम) फास्फोरस (ग्राम) पोटाश (ग्राम)
पहले वर्ष 10 100 50 100
दुसरे वर्ष 20 200 100 200
तीसरे वर्ष 30 300 150 300
चोथे वर्ष 40 400 200 400
पाचमें वर्ष व उसके बाद 50 500 250 500

इसके आलावा किसान भाई आवश्यकतानुसार जिंक सल्फेट और अन्य टोनिक खादों का प्रयोग कर सकते है| पानी में घुलनशील खादों के छिड़काव से पैदावार पर काफी अच्छा प्रभाव पड़ता है|

फुल बहार का चुनाव
अनार की फसल में तीन मौसम में फूल आते है| दिसंबर से जनवरी महीने में आनेवाले फूलों को आंबे बहार, जून से जुलाई महीने में आनेवाले फूलों को मृग बहार और सितंबर से अक्टूबर महीने में आनेवाले फूलों को हस्त बहार नाम से पहचानें जाते है| अनार के तीनों मौसम में फसल लेना आर्थिक और तकनीकी द्रष्टि से सही नहीं है|

आंबे बहार- के फल मानसून की शुरुआत में आने से बारिश की बूंदों से फल पे दाग़ हो जाते है| परिणाम स्वरूप बाजार भाव कम मिलते है|

मृग बहार- के फूलों का विकास मानसून में होने के कारण किटाणु का प्रकोप ज्यादा रहता है|

हस्त बहार- में फूलों का विकास सर्दीओ में और गर्मीओ की शुरुआत में होता है, और मार्च से अप्रैल में फल तैयार होते है| फूलों का विकास ठंडे और सूखे हवामान में होने से रोग और किटाणु का प्रकोप कम होता है| फलों का विकास अच्छा होता है, बाजार भाव अच्छे मिलते है, अनार की सिर्फ हस्त बहार फल की फसल लेना लाभदायी है|

हस्त बहार की फसल लेने हेतु मार्च से अप्रैल के फल निकालने के बाद और मानसून की बारिश बंद होने के बाद सितंबर से अक्टूबर महीने तक पानी न दें| सितंबर से अक्टूबर में उपरोक्त मात्रा के अनुसार उर्वरक और खाद देकर हल्की सिंचाई करें| इससे एकसाथ अच्छे फूल आएंगे| जिस के फल मार्च से अप्रैल में मिलेंगे और पैदावार में भी लाभ होगा|

सिंचाई और जल व्यवस्था
अनार की खेती में गर्मियों में 5 से 7 दिन, सर्दियों में 10 से 12 दिन तथा वर्षा ऋतु में आवश्यकतानुसार अन्तराल पर 20 से 40 लीटर प्रति एक पौधा सिंचाई की आवश्यकता होती हैं| अनार में टपक सिंचाई पद्धति अत्यधिक लाभप्रद हैं, क्योंकि इससे 30 से 50 प्रतिशत पानी की बचत होती हैं, साथ ही 30 से 35 प्रतिशत उपज में भी बढ़ोतरी हो जाती है, तथा फल फटने की समस्या का भी कुछ सीमा तक समाधान हो जाता हैं| टपक सिंचाई विधि हो तो एक साल के पौधे को एक दिन के अंतर पर सर्दियों में 10 लीटर और गर्मियों में 15 लीटर पानी दें|

पौधे की आयु बढ़ने के साथ पानी की मात्रा में भी बढ़ाते रहें| पांच साल के पौधे को एक दिन के अंतर पर सर्दियों में 50 लीटर और गर्मियों में 75 लीटर पानी दें| टपक सिंचाई विधि के साथ गन्ने के पत्ते का आवरण करने से 60 प्रतिशत पानी की बचत होती है| आवरण के लिए काली प्लास्टिक फिल्म का भी उपयोग कर सकते है|

खरपतवार, कटाई-छटाई व आंतरफसल
खरपतवार- अनार की खेती में साल में 2 से 3 बार पौधे के गोलाकार भाग में खुदाई करें और फसल को खरपतवार मुक्त रखे| हाथ से खरपतवार निकालना मुश्किल हो तो खरपतवारनाशी पेराकवोट या पेन्डीमीथेलीन का उपयोग कर सकते है, लेकिन सावधानीपूर्वक पौधे को बचाके छिड़काव करें|

कटाई-छटाई- अनार के पौधों में जड़ से अनेक शाखाएँ निकलती रहती हैं| यदि इनको समय-समय पर निकाला न जाये तो अनेक मुख्य तने बन जाते हैं| जिससे उपज तथा गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं| उपज तथा गुणवत्ता की दृष्टि से प्रत्येक पौधों में 3 से 4 मुख्य तने ही रखना चाहिये तथा शेष को समय-समय पर निकलते रहना चाहिये| नये पौधों को उचित आकार देने के लिये कटाई-छँटाई करना आवश्यक होता हैं| अनार में 3 से 4 साल तक एक ही परिपक्व शाखाओं के अग्रभाग में फूल और फल खिलते रहते हैं| इसलिए नियमित काँट-छाँट आवश्यक

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Dr. Popat Sonawane - Orthopaedic Surgeon, ghodnadi-shirur

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