आज के युग मे ओशो सक्रिय ध्यान

आज के युग मे ओशो सक्रिय ध्यान

आज के युग मे ओशो सक्रिय ध्यान एक ऐसा ध्यान है जो शरीर ओर मन दोनो को रिलेक्स करता है ओर नई शक्ति को जगाता है ओर कई शारीरीक मानसिक बिमारियों से तुरन्त छुटकारा दिलाता है पतंजलि ने पांच हजार साल पहले योग और ध्यान की विधियां जिस 'आदमी' के लिए दी थीं, वह 'आदमी' अब नहीं है। जैसा आदमी आज इंटनेट के इस युग में अंधी विकास की दौड़ में जिस प्रतिस्पर्धा व तनाव को जी रहा है, ऐसा आदमी जमीन पर पहले कभी भी नहीं था।यह बड़ी नई घटना है। इस नई घटना को सोचकर ओशो ने ध्यान की कुछ नई पद्धतियों का समावेश किया है। इसके पहले कि आप ध्यान में उतरें, आपके तनावों व दमन का रेचन यानी उनका हट जाना जरूरी है। आज अष्‍टांग योग के अंगों- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्‍याहार, धारणा, ध्‍यान और समाधि में से लोग सिर्फ आसन या प्राणायाम को ही पूरा योग मान लेते हैं।जबकि यह तो महज उसका हिस्सा हैं। अंतिम लक्ष्‍य तो समाधि या कम से कम ध्‍यान की स्थिति को पाना है।जयपुर में ओशो ध्‍यान केंद्र के संचालक स्वामी ओम शान्ति ने बताया कि ध्‍यान या समाधि की स्थिति का अनुभव तो अधिकांश मनुष्‍य कर ही नहीं पाते हैं। इसके लिए ओशो ने जो ध्यान विधियां बनाई है, वह शारीरिक स्‍वास्‍थ्‍य के साथ ही मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य का लाभ भी देती हैं। इसके साथ मनुष्य स्वयं में गहन शांति महसूस करता है।ओशो ध्‍यान केंद्र के फैसिलिटेटर स्वामी ओम शान्ति मानते हैं कि आज का मनुष्‍य अराजक है क्योंकि वह तनाव, प्रतिस्‍पर्धा, दमन, रुकावटों से घिरा है।

आधुनिक मनुष्‍य की जीवनशौली को ध्‍यान में रखते हुए ही ओशो ने मेडिटेशन की अराजक विधि 'डायनिमिक ध्‍यान योग' को बनाया।यह जेट युग के मनुष्‍यों के लिए जेट ध्‍यान विधि है, जो मन और शरीर दोनों को कम समय में एक लय में लाकर संपूर्ण स्‍वास्‍थ्‍य देती है और मनुष्‍य जल्‍द ही ध्‍यान की स्थिति तक पहुंच जाता है। इसके पांच चरण हैं, जानते हैं इसके बारे में।अराजक श्‍वास लेना - ओशो कहते हैं कि आज के मनुष्‍य में नकारात्‍मकता, दमन, रोष, तनाव इतना भरा हुआ है की थोड़ी सी विपरीत स्थिति उसे पूरी तरह से हिला देती है। ध्‍यान से पहले इन रुकावटों का हटना जरूरी है। जब तक मन पर जमी यह धूल नहीं हटेगी, ध्‍यान में मन ही नहीं लगेगा।अकेले शांति में बैठने का स्‍वांग तो हो सकेगा, लेकिन अस्थिर मन कहीं और होगा। इसलिए तेजी से श्‍वांस लें, यह रक्‍त की धमनियों को, शरीर को और मन को पूरी अराजक स्थिति में ले जाएगा। अराजक श्‍वांस आपके भीतर की अराजकता को बहार निकालने में मदद करेगी।

रेचन : दूसरे चरण में नकारात्‍मकता को बाहर निकाला जाता है। इसके लिए तेज संगीत में नाचना, चीखना, चिल्‍लाना, उछलना, कूदना, हंसना और हर वो काम किया जाता है, जो किसी वजह से व्‍यक्‍ित पहले नहीं कर पाया था। यदि आप किसी वजह से रो नहीं पाए थे या अपने दुख को जाहिर नहीं कर पाए थे, तो वह मन पर बोझ बनकर दबा रहेगा।यह दमन ही विकार का रूप लेगा। इसलिए इसे हटाना जरूरी होता है। इस चरण को करने के बाद शरीर और मन को स्‍वास्‍थ लाभ होता है। आज पूरे विश्‍व में मनोचिकित्सकों द्वारा केवल रेचन मात्र के प्रयोग से जटिल बीमारियों का इलाज सफलतापूर्वक किया जा रहा है।

हू का उच्‍चारण - तीसरे चरण में 'हू' ध्वनि का उच्‍चारण कराया जाता है। यह शरीर के अंदर सोई ऊर्जा को जगाने के लिए किया जाता है। 'हू' की ध्वनि सीधी नाभि केंद्र पर प्रहार करती है, जहां हमारी ऊर्जा का स्रोत है। मां के गर्भ में यहीं से हमें जीवन मिलता था। किन्तु जन्म के बाद इस अपार ऊर्जा स्रोत्र से हमारा संपर्क टूट जाता है। 'हू' की ध्वनि इस सम्बन्ध को पुनः स्थापित कर हमें असीम ऊर्जा से भर देती है।जैसे रॉकेट को अंतरिक्ष की कक्षा में पहुंचने के लिए अपार ईंधन की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार हमें ध्यान और स्वस्थ्य की अपार ऊंचाइयों को छूने के लिए इस अपार ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जोकि 'हू' की ध्वनि से प्राप्त होती है। इस चरण में दोनों हाथ आकाश की और उठाकर अपनी जगह पर उछलते हुए 'हू' की ध्वनि दस मिनट तक की जाती है।ध्‍यान - शुरुआती तीन चरण ध्‍यान की तैयारी है और यह चौथा चरण ध्यान का, मौन होने का है। प्रथम तीन चरणों में अपार आंधी को उठाया जाता है और यह चौथा चरण आंधी के बाद की शांति का होता है। प्रथम तीन चरणों में शरीर और मन को अराजकता की पराकाष्‍ठा पर पहुंचा दिया जाता है, जिसके बाद कुछ और सम्भव नहीं रह जाता है। शरीर और मन स्वतः शान्ति में प्रवेश कर जाते हैं। यह शांति अन्‍य माध्‍यमों से किए गए ध्‍यान की अपेक्षा जल्‍दी महसूस होती है क्‍योंकि एक ही सिक्‍के के दो पहलू मन और शरीर अब दो नहीं एक हो चुके होते हैं।

नृत्‍य - ओशो के ध्‍यान का आखिरी चरण नृत्‍य है। उन्होंने अपनी सभी ध्यान की विधियों में नृत्य को महत्वपूर्ण स्थान दिया है। नृत्य ध्‍यान की विधि में इसलिए शामिल किया गया है, ताकि व्‍यक्‍ित ध्‍यान की गंभीरता न पकड़े। उसमें ध्‍यान को पाने का अहंकार न बचे। वह जीवन को उल्‍लास के साथ जिए।ओशो की ध्‍यान विधि सामूहिक ध्‍यान की विधि है। इसे समूह में करने से गहरे परिणाम मिलते हैं। सबसे अच्‍छी बात यह है कि इसे सीखने या करने के लिए किसी प्रशिक्षक की जरूरत नहीं है। हालांकि, यदि किसी प्रशिक्षक की देखरेख में इन ध्‍यान की विधियों को किया जाए, तो उसका अच्‍छा लाभ मिलता है।

डायनिमिक योग के पांचों चरणों को 10-10 मिनट करना जरूरी है।

इन्‍हें यू-ट्यूब पर या ओशो डॉट कॉम पर विजिट कर सीखा जा सकता है 

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Dr. Popat Sonawane - Orthopaedic Surgeon, ghodnadi-shirur

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