ध्यान विधि : - ओशो

" ध्यान चेतना की विशुद्ध अवस्था है-जहां कोई विचार नहीं होते, कोई विषय नहीं होता। साधारणतया हमारी चेतना विचारों से, विषयों से, कामनाओं से आच्छादित रहती है। जैसे कि कोई दर्पण धूल से ढंका हो। हमारा मन एक सतत प्रवाह है- विचार चल रहे हैं, कामनाएं चल रही हैं, पुरानी स्मृतियां सरक रही हैं- रात-दिन एक अनवरत सिलसिला है। नींद में भी हमारा मन चलता रहता है, स्वप्न चलते रहते हैं। यह अ-ध्यान की अवस्था है। ठीक इससे उलटी अवस्था ध्यान की है।जब कोई विचार नहीं चलते और कोई कामनाएं सिर नहीं उठातीं, सारा ऊहापोह शांत हो जाता है और हम परिपूर्ण मौन में होते हैं-वह परिपूर्ण मौन ध्यान है। और उसी परिपूर्ण मौन में सत्य का साक्षात्कार होता है। जब मन नहीं होता, तब जो होता है वह ध्यान है। इसलिए मन के माध्यम से कभी ध्यान तक नहीं पहुंचा जा सकता। ध्यान इस बात का बोध है कि मैं मन नहीं हूं। " 

~ ओशो ♥

 प्रत्येक ध्यान के पहले रेचन जरुरी है ! रेचन तुम्हे सहयोगी होगा ! दस मिनट दौड़ लो, कूद लो ; उछल लो ; सारी उर्जा जो जम गई है , उसे फेंक दो , फिर बैठ जाओ ! जैसे तूफान के बाद की शांति आ जाती है, ऐसे रेचन के बाद शारीर हलका हो जाता है , उसकी बैचनी खो जाती है ! पर वह भूमिका है, वह कोई चरण नही ! वह मकान के बाहर की सीढ़ी है ! मकान के भीतर असली यात्रा तो शुरू होती है ; दस मिनिट ओंकार की ध्वनि शरीर से , दस मिनिट ओंकार की ध्वनि मन से ! दस मिनिट ओंकार की ध्वनि तुम्हे नही करनी , वह अस्तित्व में हो ही रही है , तुम्हे सिर्फ सुननी है ! इसलिए मैं कहता हूँ -राम , कृष्ण , बुद्ध उतने ठीक नही होंगे , दूसरे चरण तक ले जाएंगे , तीसरे चरण तक नही ले जाएंगे ; क्योंकि जो तीसरे चरण में ध्वनि हो रही है , वह ओम की है ! लेकिन कभी-कभी राम से भी कोई तीसरे चरण में पहुंच जाता है ! ओम शुद्ध ध्वनि है ! अगर तुम राम को ही पकड़कर चलोगे तो तुम्हे राम भी सुनाई पड़ने लगेगा वहाँ , लेकिन वह आरोपण है ! और आरोपण का अर्थ है --मन थोडा जिंदा है ! हम वही जानना चाहते है , जो है ! हम वही देखना चाहते है , जो है ! हम मन को उसके उपर थोपना नही चाहते , रँग नही देना चाहते ! इसलिए मंत्र, महामंत्र तो ओंकार है ! बाकी सब मंत्र छोटे-छोटे है; ............ओशो ( शिव साधना )

 

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