ध्यान आता है, एक फुसफुसाहट की तरह

ध्यान आता है, एक फुसफुसाहट की तरह

ध्यान आता है, एक फुसफुसाहट की तरह, वह नारे लगाते हुए नहीं आता । वह बहुत ही चुपचाप आता है.... यदि हम व्यस्त हैं,तो वह प्रतीक्षा करता है । और लौट जाता है ।

तो एक बात तय कर लें कि कुछ समय रोज शांत बैठें और उसकी प्रतीक्षा करें । कुछ मत करें, बस आंखें बंद करके शांत बैठ जाएं- गहन प्रतीक्षा में, एक प्रतीक्षारत् हृदय के साथ, एक खुले हृदय के साथ.... यदि कुछ न घटे तो निराश न हों । कुछ न घटे तो भी बैठना अपने आप में विश्रामदायी है । वह हमें शांत करता है, स्वस्थ करता है, तरोताजा करता है और हमें जड़ों से जोड़ता है । लेकिन धीरे-धीरे झलकें मिलने लगती हैं और एक तालमेल बैठने लगता है । हम किसी विशेष स्थिति में, विशेष कमरे में, विशेष स्थिति में प्रतीक्षा करते हैं, तो झलकें ज्यादा-ज्यादा आती हैं । वे कहीं बाहर से नहीं आती हैं, वे तुम्हारे अंतर्तम केंद्र से आती हैं । लेकिन जब अंतर्चेतना जानती है कि बाह्य चेतना उसके लिए प्रतीक्षारत है, तो मिलन की संभावना बढ़ जाती है ।

किसी वृक्ष के नीचे बस बैठ जाएं । हवा चल रही है और वृक्ष के पत्तों में सरसराहट हो रही है । हवा आपको छू रही है, आपके आसपास बह रही है, आपको छूकर गुजर रही है । लेकिन हवा को सिर्फ अपने आसपास ही मत गुजरने दें, उसे अपने भीतर से होकर भी गुजरने दें, अपने भीतर से बहने दें । अपनी आंखें बंद कर लें और महसूस करें कि जैसे हवा वृक्षों से होकर गुजरती है और पत्तों की सरसराहट होती है, वैसे ही आप भी एक वृक्ष की भांति हैं, खुले और हवा आपसे होकर बह रही है- आसपास से नहीं बल्कि सीधे आपसे होकर बह रही है ।

बगीचे में बैठे हुए बस भाव करें कि आप गायब हो रहे हैं. बस देखें कि जब आप दुनिया से विदा हो जाते हैं, जब आप यहां मौजूद नहीं रहते, जब आप एकदम मिट जाते हैं, तो दुनिया कैसी लगती है. बस एक सेकेंड के लिए न होने का प्रयोग करके देखें.

अपने ही घर में ऐसे हो जाएं जैसे कि नहीं हैं. यह बहुत ही सुंदर ध्यान है. चौबीस घंटे में आप इसे कई बार कर सकते हैं- सिर्फ आधा सेकेंड भी काफी है. आधा सेकेंड के लिए एकदम खो जाएं-

आप नहीं हैं और दुनिया चल रही है. जैसे-जैसे हम इस तथ्य के प्रति और-और सजग होते हैं, तो हम अपने अस्तित्व के एक और आयाम के प्रति सजग होते हैं, जो लंबे समय से, जन्मों-जन्मों से उपेक्षित रहा है. और वह आयाम है स्वीकार भाव का. हम चीजों को सहज होने देते हैं, एक द्वार बन जाते हैं. चीजें हमारे बिना भी होती हैं.
सिर्फ तुम ही तुम्हारे हो ! यह पहला सूत्र, मेरे अतिरिक्त मेरा कोई भी नहीं है ! 
यह बड़ा क्रांतिकारी सूत्र है, बड़ा समाज-विरोधी ! क्योंकि समाज जीता ही 
इसी आधार पर है कि दूसरे अपने है; जाति के लोग अपने हैं; देश के लोग अपने हैं; मेरा देश, मेरी जाति, मेरा धर्म, मेरा परिवार; मेरे का सारा खेल है ! समाज जीता है 'मेरे' की धारणा पर ! इसलिए धर्म समाज विरोधी तत्व है ! धर्म समाज से छुटकारा है, दूसरे से छुटकारा है ! और धर्म कहता है कि तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हारा और कोई भी नहीं ! उपर से देखने पर बड़ा स्वार्थी वचन मालूम पड़ेगा ! क्योंकि यह तो यह बात हुई कि बस हम ही अपने है, तो तत्क्षण हमें लगता है यह तो स्वार्थ कि बात है !
यह स्वार्थ कि बात नहीं है ! अगर यह तुम्हें ख्याल आ जाए, तो ही तुम्हारे जीवन में परार्थ और परमार्थ पैदा होगा !

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Dr. Popat Sonawane - Orthopaedic Surgeon, ghodnadi-shirur

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