एपल की तानाशाही!

एपल की तानाशाही!

एपल की तानाशाही!:कंपनी गलत तरीके से ऐप ब्लॉक कर रही, ऐप स्टोर पर डेवलपर्स से मनचाही कीमत वसूल रही; इसका असर ग्राहकों की जेब पर हो रहा

 

एपल की एनुअल वर्ल्डवाइड डेवलपर्स कॉन्फ्रेंस 7 जून से शुरू हो चुकी है। इवेंट के पहले दिन कंपनी का सारा फोकस सॉफ्टवेयर पर रहा। आईफोन अब जल्द ही अमेरिका के एयरपोर्ट पर डिजिटल आईडी का काम भी करेगा। कंपनी ने अपने डेवलपर्स के लिए iOS 15 का प्रिव्यू जारी कर दिया है। हालांकि, एपल और डेवलपर्स के बीच सबकुछ ठीक नहीं है।

कुछ डेवलपर्स आईफोन ऐप्स को लेकर एपल की तानाशाही से नाराज हैं। उनकी शिकायत है कि एपल उनसे और आईफोन यूजर्स से कई चीजों की अनुचित कीमत वसूल रही है। ये ऐसा विवाद है जिसे समझने की बहुत जरूरत है।

एपल से डेवलपर्स की नाराजगी क्यों?
ऐप बनाने वाली कुछ कंपनियों और लॉमेकर्स का कहना है कि आईफोन ऐप्स को एपल दबंग तरीक से कंट्रोल करती है। कुछ लोग इस बात से नाराज हैं कि ऑनलाइन डेटिंग सर्विस की मेंबरशिप लेने या क्लैश ऑफ क्लैंस गेम में वर्चुअल जेम्स खरीदने पर एपल द्वारा लिए जाने वाले बड़ा कमीशन उनकी मजबूरी बन गया है। एपल आईफोन पर मौजूद सभी ऐप्स से 30 प्रतिशत कमीशन लेती है। हालांकि, उसने सबसे ज्यादा बिकने वाले ऐप्स का कमीशन घटाकर अब 15% कर दिया है। इस बदलाव से एपल का ऐप रेवन्यू भी प्रभावित हुआ है।

कुछ ऐप डेवलपर्स का मानना ​​​​है कि एपल गलत तरीके से उनके ऐप को ब्लॉक कर देती है, या उन्हें एपल की कॉम्पिटिटर इंटरनेट सर्विस के लिए नुकसान पहुंचाती है। एपल की तानाशाही को लेकर शिकायत करने वाले मिलियन ऐप्स के बीच काफी कम हैं, लेकिन उनकी शिकायत जायज भी है। इसमें स्पॉटिफाई, मैच ग्रुप, एयरबीएनबी, टाइल और फोर्टनाइट वीडियो गेम के डेवलपर एपिक गेम्स शामिल हैं।

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शिकायतकर्ताओं के क्या पॉइंट हैं?
एपल 2008 से अपने ऐप स्टोर को उसी दृष्टिकोण के साथ चला रही है। ऐप्स के साथ लोगों का अपनापन एपल के लिए अपने प्रतिबंधों और कमीशन को उचित ठहराना कठिन बना देता है। जैसे कि लोग कंपनी की मदद के बिना ऐप्स नहीं ढूंढ सकते। एपल ऐप स्टोर पर नियंत्रण रखने के लिए तेजी से बीजान्टिन नियम भी बनाती है। ये हमेशा समझ में नहीं आते हैं।

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि बड़ा सवाल यह है कि आईफोन पर एपल की पकड़ से कई बार अच्छे ऐप्स या नए आइडिया भी हमसे दूर हो जाते हैं, क्योंकि इन्हें तैयार करने वाले डेवलपर्स एपल की मोनोपॉली, शर्तों और ज्यादा कमीशन के आगे नहीं आ पाते।

एपल कुछ मामलों में थोड़ा सही भी
कंपनी का कहना है कि वह ऐप इकोनॉमी में अपनी भूमिका के लिए मुआवजे की हकदार है। एपल करोड़ों संभावित ग्राहकों को ऐप मेकर्स के दरवाजे पर लाती है। इससे लोगों के लिए सामान खरीदना आसान होता है। और यह सुनिश्चित करने के लिए ऐप्स स्क्रीन भी करती है ताकि वे सुरक्षित रहें। एपल ऐप मेकर्स और बाकी लोगों के लिए जो कुछ करती है उससे उसकी प्राइस बढ़ जाती है, लेकिन उसका ये कंट्रीब्यूशन मीनिंगफुल होता है।

ऐप में हो रही उथल-पुथल का समाधान क्या है?
द न्यूयॉर्क टाइम्स की टेक्नोलॉजी कॉलमनिस्ट, शीरा ओविड के पास इसके दो सुझाव हैं। इसमें एक हल्का और दूसरा आक्रामक है। एपल सबसे पहले उन ऐप मेकर्स को ब्लॉक करना बंद करे जो लोगों को यह बताते हैं कि उन्हें ऐप में सामान नहीं खरीदना है। उदाहरण के लिए, यदि यूट्यूब म्यूजिक स्ट्रीमिंग सब्सक्रिप्शन आईफोन ऐप में खरीदते हैं तब उसकी कीमत 12.99 डॉलर (करीब 950 रुपए) महीना है। वहीं, इसे यूट्यूब म्यूजिक वेबसाइट से खरीदते हैं तब इसकी कीमत 9.99 डॉलर (करीब 720 रुपए) महीना है। यूट्यूब, एपल को 3 डॉलर (करीब 220 रुपए) का कमीशन देता है, लेकिन इसका भार ग्राहक की जेब पर आता है।

ओविड के सहयोगी ग्रेग बेंसिंगर का कहना है- अगर ऐप मेकर्स को उन वेबसाइटों से लिंक करने की अनुमति दी जाती है, जहां लोग कम कीमत में सब्सक्रिप्शन या डिजिटल सामान खरीद सकते हैं, तो भी बहुत से लोग ऐसा नहीं करेंगे। हालांकि ऐसा करने से एपल को ग्राहकों की तरफ से अच्छा रिस्पॉन्स मिलेगा।

ऑप्शनल ऐप स्टोर को पूरी तरह से खत्म होना चाहिए। सिंगल डिजिटल स्टोरफ्रंट से ऐप्स ढूंढना, पेमेंट करना और डाउनलोड करना आसान और यकीनन ज्यादा सुरक्षित है, लेकिन मुझे अब यकीन नहीं है कि यह ऐप स्टोर मालिकों द्वारा हायर कॉस्ट और कंट्रोल के लायक है। क्या होगा यदि हमने अभी-अभी कंपनियों की वेबसाइटों से टिंडर या यूट्यूब म्यूजिक ऐप डाउनलोड किया है?

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