ध्यान : प्रमुदिता प्रकाश है

क्या तुमने अनुभव किया है कि तुम अति प्रसन्न थे और साथ ही अपनी भावना को व्यक्त करने में भयभीत भी?

 प्रमुदिता कि हम प्रसन्न हों। हम इतने प्रसन्न हों कि हम मौत को और दुख को गलत कर दें। हम इतने आनंदित हों कि मौत और दुख सिकुड़कर मर जाएं। पता भी न चले कि मौत और दुख भी हैं।

जो इतनी प्रफुल्लता और आनंद को अपने भीतर संजोता है, वह साधना में गति करता है। साधना की गति के लिए यह बहुत जरूरी है, बहुत जरूरी है।

एक साधु हुआ। वह जीवनभर इतना प्रसन्न था कि लोग हैरान थे। लोगों ने कभी उसे उदास नहीं देखा, कभी पीड़ित नहीं देखा। उसके मरने का वक्त आया और उसने कहा कि 'अब मैं तीन दिन बाद मर जाऊंगा। और यह मैं इसलिए बता रहा हूं कि तुम्हें स्मरण रहे कि जो आदमी जीवन भर हंसता था, उसकी कब्र पर कोई रोए नहीं। यह मैं इसलिए बता रहा हूं कि जब मैं मर जाऊं, तो इस झोपड़े पर कोई उदासी न आए। यहां हमेशा आनंद था, यहां हमेशा खुशी थी। इसलिए मेरी मौत को एक उत्सव बनाना। मेरी मौत को दुख मत बनाना, मेरी मौत को एक उत्सव बनाना।'

 

लोग तो दुखी हुए, बहुत दुखी हुए। वह तो अदभुत आदमी था। और जितना अदभुत आदमी हो, उतना उसके मरने का दुख घना था। और उसको प्रेम करने वाले बहुत थे, वे सब तीन दिन से इकट्ठे होने शुरू हो गए। वह मरते वक्त तक लोगों को हंसा रहा था और अदभुत बातें कह रहा था और उनसे प्रेम की बातें कर रहा था। सुबह मरने के पहले उसने एक गीत गाया। और गीत गाने के बाद उसने कहा, 'स्मरण रहे, मेरे कपड़े मत उतारना। मेरी चिता पर मेरे पूरे शरीर को चढ़ा देना कपड़ों सहित। मुझे नहलाना मत।'

उसने कहा था, आदेश था। वह मर गया। उसे कपड़े सहित चिता पर चढ़ा दिया। वह जब कपड़े सहित चिता पर रखा गया, लोग उदास खड़े थे, लेकिन देखकर हैरान हुए। उसके कपड़ों में उसने फुलझड़ी और फटाखे छिपा रखे थे। वे चिता पर चढ़े और फुलझड़ी और फटाखे छूटने शुरू हो गए। और चिता उत्सव बन गयी। और लोग हंसने लगे। और उन्होंने कहा, 'जिसने जिंदगी में हंसाया, वह मौत में भी हमको हंसाकर गया है।'

जिंदगी को हंसना बनाना है। जिंदगी को एक खुशी और मौत को भी एक खुशी। और जो आदमी ऐसा करने में सफल हो जाता है, उसे बड़ी धन्यता मिलती है और बड़ी कृतार्थता उपलब्ध होती है। और उस भूमिका में जब कोई साधना में प्रवेश करता है, तो गति वैसी होती है, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। तीर की तरह विकास होता है।

बोझिल मन से जो जाता है, उसने तीर में पत्थर बांध दिए हैं। बोझिल मन से जो जाता है, उसने तीर में पत्थर बांध दिए, तीर कहां जाएगा? जितनी तीव्र गति चाहिए हो, उतना हलका और भारहीन मन चाहिए। जितने तीर को दूर पहुंचाना हो, उतना तीर में वजन कम चाहिए। और जिसे जितने ऊंचे पहाड़ चढ़ने हों, उतना बोझ उसे नीचे छोड़ देना पड़ता है। और सबसे बड़ा बोझ दुख का और विषाद का है, उदासी का है। इससे बड़ा कोई बोझ नहीं है।

क्या आप लोगों को देखते हैं? वे दबे चले जा रहे हैं, जैसे भारी बोझ उनके सिर पर रखा हुआ है। इस बोझ को नीचे फेंक दें और उत्फुल्लता की एक हुंकार करें और सिंहनाद करें और यह बता दें पूरे जीवन को कि जीवन कैसा ही हो, उसमें भी खुशी और जिंदगी गीत बनायी जा सकती है। जिंदगी एक संगीत हो सकती है। इस प्रमुदिता को स्मरण रखें।

 

 

ओशो: ध्यान-सूत्र, पांचवां प्रवचन

 

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