ब्रेस्ट कैंसर के लिए कीमोथेरेपी क्यों ज़रूरी है?

जम्मू में रहने वाली कमल कामरा को ब्रेस्ट कैंसर था. नवंबर में उनकी ब्रेस्ट सर्जरी हुई और जनवरी में कीमोथेरेपी शुरू हो गई.

कमल कहती हैं कि अगर मैं अपने केस को देखते हुए बोलूं तो मुझे लगता है कि लोगों में डर ज़्यादा है. जबकि इतना घबराने की ज़रूरत है नहीं.

"पहले कीमो सेशन के दौरान मुझे डर लगा था. मुझे कीमो के आठ सेशन लेने के लिए बोला गया था. लेकिन बाद में मुझे कहा गया कि चार ही सेशन काफी हैं."

अपने अनुभव के बारे में कमल बताती हैं, "यह बिल्कुल वैसे ही है, जैसे ग्लूकोज़ चढ़ता है. तीन घंटे के भीतर दवा शरीर में घुल जाती है. हालांकि थोड़ी कमज़ोरी महसूस होती है और मुंह में छाले भी पड़ जाते हैं, लेकिन बहुत अधिक डरने की ज़रूरत नहीं है."

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कमल कहती हैं कि ब्रेस्ट सर्जरी के बाद सबसे अधिक साइकोलॉजिकल दबाव होता है. शरीर का एक हिस्सा कट चुका होता है...बाल झड़ रहे होते हैं. लोगों के सवाल ज़्यादा एहसास कराते हैं.

कमल जैसी बहुत सी महिलाएं हैं जो पहले कैंसर के दर्द से जूझती हैं और बाद में साइकोलॉजिकल दबाव से. लेकिन हाल में हुई एक स्टडी बहुत सी महिलाओं के लिए वरदान साबित हो सकती है.

इस रिसर्च में ये दावा किया गया है कि अगर शुरुआत में ही महिलाएं सजगता बरतें और जांच कराएं तो वे कीमोथेरेपी कराने से बच सकती हैं.

इसके अनुसार, ब्रेस्ट कैंसर पीड़ित क़रीब 70 फ़ीसदी औरतों को तो कीमोथेरेपी की ज़रूरत ही नहीं होती. अगर ब्रेस्ट कैंसर के ख़तरे को शुरुआती वक़्त में ही भांप लिया जाए तो बहुत सी महिलाओं को कीमोथेरेपी के दर्द से बचाया जा सकता है.

इसमें आनुवांशिक जांच भी शामिल है.

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इस रिसर्च के सामने आने के बाद कैंसर का इलाज करने वाले डॉक्टरों का कहना है कि इससे महिलाओं को कीमोथेरेपी के दर्द को नहीं सहना पड़ेगा. सिर्फ़ सर्जरी और हार्मोन थेरेपी से ही उनका इलाज संभव हो जाएगा.

कीमोथेरेपी को ख़ासतौर पर सर्जरी के बाद किया जाता है ताकि ब्रेस्ट कैंसर बढ़े नहीं या फिर दोबारा न हो जाए.

मौजूदा समय में जिन महिलाओं का कैंसर टेस्ट लो स्कोर होता है उन्हें कीमो की ज़रूरत नहीं होती है लेकिन जिनमें हाई स्कोर होता है, उन्हें निश्चित तौर पर कीमो करवाने के लिए कहा जाता है.

लेकिन औरतों की एक बड़ी संख्या ऐसी होती है जो न तो लो स्कोर में होती हैं और न ही हाई स्कोर में...ऐसी स्थिति में अक्सर असमंजस होता है कि क्या करें और क्या नहीं.

अगर आंकड़ों की बात की जाए तो इन औरतों के सर्वाइव करने की संभावना कीमो के बिना और कीमो के बाद...दोनों ही स्थिति में बराबर होती है.

कितनी वाजिब है ये स्टडी?

अपोलो हॉस्पिटल में बतौर ब्रेस्ट कैंसर सर्जन काम करने वाले डॉक्टर शोएब ज़ैदी कहते हैं कि ये रिसर्च भारतीय संदर्भ में उतनी वाजिब नहीं है जितना पश्चिमी देशों के संदर्भ में.

डॉक्टर ज़ैदी के मुताबिक़, "पश्चिमी देशों में ब्रेस्ट कैंसर के जो ज़्यादातर (लगभग 70 फ़ीसदी मामले) मामले आते हैं वो प्रारंभिक चरण में होते हैं लेकिन भारत में ज़्यादातर मामले एडवांस स्टेज में सामने आते हैं. ऐसे में कीमोथेरेपी करना ज़रूरी हो ही जाता है."

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"ये स्टडी मुख्य रूप से उन लोगों के लिए है जिनका कैंसर शुरुआती दौर में हो. किसी को कीमोथेरेपी की ज़रूरत है या नहीं ये पता लगा पाना इतना आसान भी नहीं होता. कई बार कुछ टेस्ट करने पड़ते हैं. इसके लिए Oncotype DX टेस्ट कराना पड़ता है लेकिन ये टेस्ट काफी महंगा होता है. ऐसे में एक बहुत बड़ा वर्ग ये टेस्ट नहीं करा पाता. इस टेस्ट की क़ीमत, कीमोथेरेपी से ज्यादा होती है."

डॉक्टर ज़ैदी कहते हैं कि अगर ये टेस्ट हो जाए तो ये पता चल जाता है कि कैंसर के दोबारा हो जाने के चांसेज़ कितने हैं. अगर डॉक्टर को ऐसा लगता है कि कैंसर दोबारा से नहीं होगा तो कीमोथेरेपी नहीं दी जाती है, लेकिन अगर लगता है कि कैंसर का ख़तरा आगे भी हो सकता है तो कीमो की जाती है.

बतौर डॉक्टर ज़ैदी, डॉक्टरों द्वारा कीमोथेरेपी की सलाह इसलिए दी जाती है कि कोई ख़तरा न रह जाए. क्योंकि ब्रेस्ट कैंसर को लेकर अब भी महिलाओं में उतनी जागरुकता नहीं है और ऐसे में जो ज़्यादातर मामले आते हैं वो एडवांस स्टेज में ही आते हैं. ऐसे में होता ये है कि "सेफ़ साइड" लेते हुए डॉक्टर कीमो की सलाह देते हैं.

क्या होता है असर?

कीमोथेरेपी से कई ज़िंदगियां तो बच जाती हैं लेकिन कीमोथेरेपी के दौरान दी गईं दवाइयों का लंबे समय तक असर बना रहता है. जिससे उल्टियां आना, चक्कर आना, बांझपन और नसों में दर्द जैसी परेशानियां हो जाती हैं.

कई मामलों में तो ये दिल का दौरा पड़ने का भी कारण हो सकता है. कुछ महिलाओं में कीमोथेरेपी के बाद ल्यूकोमेनिया की शिकायत हो जाती है.

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ब्रेस्ट कैंसर के कारण क्या-क्या हो सकते हैं...?

-जिन औरतों की शादी नहीं होती है उनमें ब्रेस्ट कैंसर का ख़तरा अधिक होता है.

- जो महिलाएं ब्रेस्टफ़ीड नहीं करातीं, उनमें भी ब्रेस्ट कैंसर का ख़तरा अधिक होता है.

- जिन महिलाओं का पीरियड्स लंबे समय तक रहता है, उनमें भी इसका ख़तरा अधिक होता है.

- बढ़ती उम्र के साथ इसका ख़तरा बढ़ता जाता है.

- अगर पहली प्रेग्नेंसी में देरी होती है तो भी ब्रेस्ट कैंसर का ख़तरा बढ़ जाता है.

कहां हुई है ये रिसर्च?

न्यूयॉर्क के अल्बर्ट आइंस्टाइन कैंसर सेंटर में हुई इस रिसर्च में कहा गया है कि अगर समय रहते पता चल जाए तो कीमो के दर्द के साथ ही बिना वजह पैसे ख़र्च होने से भी रोका जा सकता है.

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हालांकि ये अध्ययन सिर्फ़ औऱ सिर्फ़ उन महिलाओं के लिए है जिनमें ब्रेस्ट कैंसर शुरुआती दौर में ही पकड़ में आ जाए. या फिर जो हॉर्मोन थेरेपी करवा रही हों और जिनका कैंसर लिम्फ़ नोड्स (लसिका) तक नहीं पहुंचा हो.

 

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क्या हैं लक्षण...?

डॉक्टर ज़ैदी मानते हैं कि भारतीय महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का ख़तरा बढ़ रहा है. चिंता की बात ये है कि भारतीय महिलाओं में जागरुकता की कमी है.

ब्रेस्ट में आई गांठ को वे संजीदगी से नहीं लेती हैं.

अगर लक्षणों की बात की जाए तो शुरुआती समय में ब्रेस्ट में गांठ महसूस होती है. पहले तो इसमें कोई दर्द नहीं होता है लेकिन एक वक्त के बाद इसमें दर्द भी होने लगता है और गांठ बड़ी होती जाती है.

समय पर डॉक्टर के पास नहीं जाएं तो ये गांठ बढ़ जाती है और इसमें पस भरने लगता है और ये फटकर निकलने भी लगता है.

ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में सबसे अहम सर्जरी होती है. एडवांस केस में सर्जरी के अलावा कीमोथेरेपी की जाती है. साथ ही हॉर्मोनल इंजेक्शन भी दिए जाते हैं. इसके अलावा रेडियो थेरेपी भी होती है. जिसमें एक्स-रेज़ दी जाती हैं, जिससे ट्यूमर खत्म होता है.

 

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