षड्जग्राम-तान बोधिनी

षड्जग्राम-तान बोधिनी
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षड्जग्राम-तान बोधिनी

षड्जहीन

तानें

ऋषभहीन

तानें

पंचमहीन

तानें

निषादहीन

तानें

षड्जपंचम-

हीन तानें

निषादगांधार-

हीन तानें

पंचमऋषभ-

हीन तानें

अग्निष्टोम

स्विष्टकृत्

अश्वक्रान्त

चातुर्मास्य

इडा

ज्योतिष्टोम

सौभाग्यकृत्

अत्यग्निष्टोम

बहुसौवर्ण

रथक्रान्त

संस्था

पुरुषमेध

दर्श

कारीरी

वाजपेय

गोसव

विष्णुक्रान्त

शस्त्र

श्येन

नान्दी

शान्तिकृत्

षोडशी

महाव्रत

सूर्यक्रान्त

उक्थ

वज्र

पौर्णमासक

पुष्टिकृत्

पुण्डरीक

विश्वजित्

गजक्रान्त

सौत्रामणी

इषु

अश्वप्रतिग्रह

वैनतेय

अश्वमेध

ब्रह्मयज्ञ

वलभित्

चित्रा

अंगिरा

रात्रि

उच्चाटन

राजसूय

प्राजापत्य

नागपक्ष

उद्भिद्

कंक

सौभर

वशीकरण

 

उपरोक्त तालिका में षड्जहीन और षड्जपंचमहीन तानों के प्रयोग का उल्लेख है। लेकिन वर्तमान में लौकिक रागों में जो तानें उपलब्ध हैं, उनमें तो इस प्रकार की तानें उपलब्ध नहीं हैं। दूसरे स्तम्भ में स्विष्टकृत् याग के लिए ऋषभहीन तानों के प्रयोग का औचित्य इस प्रकार दिया जा सकता है कि अग्निहोत्र आदि इष्टियों में इष्टि के अन्त में जो प्राण शेष बचते हैं, जिन्हें इष्टि का लाभ नहीं मिल पाता, वह उपद्रव करते हैं(समाज में तो ऐसा सर्वत्र होता ही है)। इन निचले प्राणों की तुष्टि के लिए स्विष्टकृत् आहुति दी जाती है(शतपथ ब्राह्मण ११.१.६.३०)। कहा गया है कि जो उच्च स्तर के प्राण हैं, वह इन निचले स्तर के प्राणों से घृणा करते हैं, इसलिए स्विष्टकृत् आहुति अन्य प्राणों के लिए दी गई आहुति के स्थान से बचाकर दी जाती है। इसी प्रकार पत्नी के लिए भी स्विष्टकृत् आहुति का विधान है(शांखायन ब्राह्मण ३.९)। स्विष्टकृत् को वास्तु कहा गया है। ऋषभ स्वर का प्रयोग दक्षता प्राप्ति के लिए किया जाता है। स्वाभाविक है कि निचले प्राणों के लिए, पत्नी रूपी प्रकृति के लिए दक्षता का सिद्धान्त नहीं चलता। अतः यहां ऋषभहीन तानों के प्रयोग का निर्देश है। यही स्थिति महाव्रत नामक सोमयाग में भी है।  आरोह-अवरोह दोनों में ऋषभहीन राग गोपीवसन्त, कमलमनोहरी, कामकेश व हरीनाट हैं। इससे अगला स्तम्भ पञ्चमहीन तानों का है। पंचमहीन राग कईं हैं। इससे अगला स्तम्भ निषादहीन तानों का है। इस स्तम्भ में उक्थ व उद्भिद् आदि के लिए निषादहीन तानों के प्रयोग का निर्देश है। उक्थ से तात्पर्य सोए हुए प्राणों को उठाने का, जगाने का है। उद्भिद् से अभिप्राय उन प्राणों से है जो सीधे उठ खडे होते हैं। प्रकृति में उद्भिद् प्राण वनस्पति जगत के हैं। निषाद स्वर में निषाद शब्द निःशेषेण सीदति, अर्थात् पूर्ण रूप से बैठ जाता है, इस अर्थ का द्योतक है। अतः यह उद्देश्य के विपरीत है। निषादहीन तान का प्रयोग बंगालभैरव जैसे एकाध राग में ही हुआ है। इससे अगला स्तम्भ निषादगान्धारहीन तानों का है। इस स्तम्भ में दर्श व पौर्णमास आदि इष्टियों के लिए निषादगान्धारहीन तानों के प्रयोग का निर्देश है। इसका औचित्य यह दिया जा सकता है कि गान्धार स्वर में आरोहण-अवरोहण विद्यमान रहता है, जबकि दर्श और पूर्णिमा का चन्द्रमा इस आरोहण-अवरोहण की स्थिति से मुक्त है। तान को गान्धार के साथ-साथ निषाद स्वर से भी रहित करने का क्या उद्देश्य है, यह अन्वेषणीय है। निषादगान्धारहीन तानों वाले राग श्रीकल्याण, गुणकरी, जलधर केदार, दुर्गा बिलावल व यशरंजनी हैं। इससे अगले स्तम्भ में पंचमऋषभहीन तानों का प्रयोग कहां-कहां किया जाना है, इसका निर्देश है। शान्तिकृत्, पुष्टिकृत्, उच्चाटन, वशीकरण आदि उद्देश्यों के लिए पंचमऋषभहीन तानों के प्रयोग का निर्देश है। पंचमऋषभहीन तानों वाले राग चन्द्रकौंस, दुर्गाभैरव, भिन्नषड्ज, मालकौंस, राजेश्वरी, सांझ का हिंडोल, व हिंडोल हैं। कहा गया है कि मालकौंस राग का प्रयोग शिव सर्पों को माला की भांति गले में धारण हेतु करते हैं। यह शान्तिकृत् व वशीकरण का एक उदाहरण हो सकता है।

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Dr. Popat Sonawane - Orthopaedic Surgeon, ghodnadi-shirur

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