जीवन परम आनंद हो सकता है, वह इतना ऊब भरा क्यों है?
Submitted by Anand on 24 July 2019 - 12:48pmजीवन परम आनंद हो सकता है, वह इतना ऊब भरा क्यों है?
तुमने कभी अपने शरीर को अनुभव नहीं किया। तुम्हारे हाथ हैं, लेकिन तुमने उन्हें भी कभी अनुभव नहीं किया। तुमने कभी नहीं जाना कि हाथ क्या कहते हैं, वे सतत तुम्हें क्या क्या सूचनाएं देते रहते हैं। हाथ कभी भारी और उदास होता है और कभी हलका और प्रफुल्लित। कभी उसमें रसधार बहती है और कभी सब कुछ मुर्दा मुर्दा हो जाता है। कभी तुम उसे जीवंत और नृत्य करते हुए पाते हो और कभी ऐसा लगता है कि उसमें जीवन नहीं है, वह जड़ और मृत है, तुमसे लटका है, लेकिन जीवित नहीं है।
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