खजूर की खेती

खजूर की खेती

धोरों में बागवानी को लेकर किसानों में क्रेज बढ़ रहा है। अब तक खजूर व अनार की खेती करने वाले बाड़मेर के किसान थाइलैंड के ड्रैगन फल भी उगाने लगे हैं। जिले के 4 गांवों के किसानों ने पहली बार ड्रैगन के 2000 पौधे लगाए हैं। वातावरण मुफीद रहने से रेगिस्तानी इलाकों में इसकी खेती का प्रयोग सफल साबित हुआ है। यह फल मूल रूप से मध्य अमेरिका का है। इसके अलावा यह थाइलैंड, वियतनाम इजराइल और श्रीलंका में भी उपजता है। चीन में इसकी सबसे अधिक मांग होने से इसे ड्रैगन फ्रूट के नाम की पहचान मिली है। जिले के सिवाना क्षेत्र के मिठौड़ा, पादरु, जागसा व बुड़ीवाड़ा में थाइलैंड के ड्रैगन फलों की खेती की जा रही है। प्रगतिशील किसान ओमसिंह बताते हैं कि गुजरात के गांधीधाम से ड्रैगन की खेती की जानकारी जुटाई। पहले तो सिर्फ 12 पौधे लगाए। मौसम अनुकूल होने से वृद्धि होने लगी। इसके बाद फौजाराम, राजू पटेल, विक्रमसिंह व कलाराम ने भी अपने फार्महाउस में ड्रैगन के पौधे लगाए हैं। उन्होंने बताया कि देश में अभी महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में इसकी खेती होती है। 

40 डिग्री तक तापमान सहने की क्षमता है पौधे में : ड्रैगन फ्रूट के पौधे को इसके बीजों से भी तैयार किया जाता है। बीजारोपण के बाद 11 से 14 दिन के अंतराल में यह पौधा उगना शुरू हो जाता है। अच्छे फलों के लिए पौधे में से ही 20 सेमी लंबी कटिंग लेकर नर्सरी में रोपना चाहिए। जड़ें निकलने के बाद खेत और घरों में लगाया जा सकता है। दस पौंड वजनी होने पर इस पौध में से फूल आने लगते हैं और उसके बाद फल। यह पौधा 30 से 40 डिग्री तक तापमान सह सकता है, लेकिन ज्यादा ठंड इसके लिए ठीक नहीं होती। राजस्थान का तापमान इस फल का उपजाने के लिए मुफीद माना जा रहा है।

जैसलमेरमें राजकीय खजूर फार्म सागरा भोजका में 9 किस्मों का प्रदर्शन प्रायोगिक तौर पर लगाया गया है। इनमें से 7 मादा 2 नर किस्में हैं। मादा किस्में इस प्रकार से हैं : 

बरही: अधिकपैदावार देने वाली किस्म का फल मध्यम आकार का और स्वाद मीठा होता है। पकाव देरी से, उपज प्रति पौधा 100-150 किलो। 

खुनेजी: इसकिस्म के फल डोका अवस्था में लाल मीठे। प्रति पौधा उपज 40 से 60 किलो तक। 

जामली: देरीसे पकने वाली इस किस्म के फलों का रंग सुनहरा पीला। पूर्ण डोका अवस्था में मुलायम-मीठा। उपज प्रति पौधा 80 से 100 किलो। 

खदरावी: इसकेपौधे छोटे होते हैं। पिंडखजूर बनाने के लिए उपयोगी इस किस्म में 60 किलो तक प्रति पौध उपज। 

सगाई: पीलेरंग की किस्म पूर्ण पकने पर ही खाने योग्य। औसत उपज 60 से 100 किलो प्रति पौधा। 

खलास: उत्पत्तिसउदी अरब इराक से। डोका अवस्था में पीले-मीठे, पिंड अवस्था में सुनहरे भूरे। उपज 60-80 किलो प्रति पौध। 

मेडजूल: उत्पत्तिमोरको से। डोका अवस्था में पीला नारंगीपन। पकाव देरी से, छुआरा बनाने के लिए उपयोगी। उपज 75 से 100 किलो प्रति पौधा। 

नरकिस्में 

धनामी मेल : इसपौधे पर 10-15 फूल आते हैं, प्रत्येक में 15-20 ग्राम परागकण निकलते हैं परंतु इस किस्म में 8-10 दिन देरी से परागकण मिलते हैं। 

मदसरीमेल : इसकिस्म के पौधे में 3-5 फूल आते हैं, प्रत्येक में 3 से 6 परागकण निकलते हैं।

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Dr. Popat Sonawane - Orthopaedic Surgeon, ghodnadi-shirur

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