लोककथा

अपना-पराया - हरिशंकर परसाई

लेखक: 
हरिशंकर परसाई

'आप किस स्‍कूल में शिक्षक हैं?'

'मैं लोकहितकारी विद्यालय में हूं। क्‍यों, कुछ काम है क्‍या?'

'हाँ, मेरे लड़के को स्‍कूल में भरती करना है।'

'तो हमारे स्‍कूल में ही भरती करा दीजिए।'

'पढ़ाई-‍वढ़ाई कैसी है?

'नंबर वन! बहुत अच्‍छे शिक्षक हैं। बहुत अच्‍छा वातावरण है। बहुत अच्‍छा स्‍कूल है।'

'आपका बच्‍चा भी वहाँ पढ़ता होगा?'

'जी नहीं, मेरा बच्‍चा तो 'आदर्श विद्यालय' में पढ़ता है।' Read More : अपना-पराया - हरिशंकर परसाई about अपना-पराया - हरिशंकर परसाई

सुधार - हरिशंकर परसाई

लेखक: 
हरिशंकर परसाई

एक जनहित की संस्‍था में कुछ सदस्‍यों ने आवाज उठाई, 'संस्‍था का काम असंतोषजनक चल रहा है। इसमें बहुत सुधार होना चाहिए। संस्‍था बरबाद हो रही है। इसे डूबने से बचाना चाहिए। इसको या तो सुधारना चाहिए या भंग कर देना चाहिए।

संस्‍था के अध्‍यक्ष ने पूछा कि किन-किन सदस्‍यों को असंतोष है।

दस सदस्‍यों ने असंतोष व्‍यक्‍त किया।

अध्‍यक्ष ने कहा, 'हमें सब लोगों का सहयोग चाहिए। सबको संतोष हो, इसी तरह हम काम करना चाहते हैं। आप दस सज्‍जन क्‍या सुधार चाहते हैं, कृपा कर बतलावें।'

और उन दस सदस्‍यों ने आपस में विचार कर जो सुधार सुझाए, वे ये थे - Read More : सुधार - हरिशंकर परसाई about सुधार - हरिशंकर परसाई

चंदे का डर - हरिशंकर परसाई

लेखक: 
हरिशंकर परसाई

एक छोटी-सी समिति की बैठक बुलाने की योजना चल रही थी। एक सज्‍जन थे जो समिति के सदस्‍य थे, पर काम कुछ नहीं, गड़बड़ पैदा करते थे और कोरी वाहवाही चाहते थे। वे लंबा भाषण देते थे।

वे समिति की बैठक में नहीं आवें, ऐसा कुछ लोग करना चाहते थे, पर वे तो बिना बुलाए पहुँचने वाले थे। फिर यहाँ तो उनको निमंत्रण भेजा ही जाता, क्‍योंकि वे सदस्‍य थे। Read More : चंदे का डर - हरिशंकर परसाई about चंदे का डर - हरिशंकर परसाई

समझौता - हरिशंकर परसाई

समझौता - हरिशंकर परसाई
लेखक: 
हरिशंकर परसाई

अगर दो साइकिल सचार सड़क पर एक-दूसरे से टकराकर गिर पड़े तो उनके लिए यह लाजिमी हो जाता है कि वे उठकर सबसे पहले लड़ें, फिर धूल झाड़ें। यह पद्धति इतनी मान्‍यता प्राप्‍त कर चुकी हैं कि गिरकर न लड़ने वाला साइकिल सवार बुजदिल माना जाता है, क्षमाशील संत नहीं।

एक दिन दो साइकिलें बीच सड़क पर भिड़ गईं। उनके सवार जब उठे तो एक-दूसरे को ललकारा, 'अंधा है क्‍या? दिखता भी नहीं।'

दूसरे ने जवाब दिया, 'साले, गलत 'साइड' से चलेंगे और आँखें दिखाएँगे।'

पहले ने गाली का बदला उससे बड़ी गाली से चुकाकर ललकारा, 'जबान सँभालकर बोलना, अभी खोपड़ी फोड़ दूँगा।' Read More : समझौता - हरिशंकर परसाई about समझौता - हरिशंकर परसाई

दानी - हरिशंकर परसाई

लेखक: 
हरिशंकर परसाई

बाढ़-पीड़ितों के लिए चंदा हो रहा था। कुछ जनसेवकों ने एक संगीत-समारोह का आयोजन किया, जिसमें धन एकत्र करने की योजना बनाई। वे पहुँचे एक बड़े सेठ साहब के पास। उनसे कहा, 'देश पर इस समय संकट आया है। लाखों भाई-बहन बेघर-बार हैं, उनके लिए अन्‍न-वस्‍त्र जुटाने के लिए आपको एक बड़ी रकम देनी चाहिए। आप समारोह में आइएगा।'

वे बोले, 'भगवान की इच्‍छा में कौन बाधा डाल सकता है। जब हरि की इच्‍छा ही है तो हम किसी की क्‍या सहायता कर सकते हैं? फिर भैया, रोज दो-चार तरह का चंदा तो हम देते हैं और व्‍यापार में कुछ दम नहीं हैं।' Read More : दानी - हरिशंकर परसाई about दानी - हरिशंकर परसाई

रसोई घर और पाखाना - हरिशंकर परसाई

रसोई घर और पाखाना - हरिशंकर परसाई
लेखक: 
हरिशंकर परसाई

गरीब लड़का है। किसी तरह हाई स्‍कूल परीक्षा पास करके कॉलेज में पढ़ना चाहता है। माता-पिता नहीं हैं। ब्राह्मण है।

शहर में उसी के सजातीय सज्‍जन के यहाँ उसके रहने और खाने का प्रबंध हो गया। मैंने इस मामले में थोड़ी-सी मदद कर दी थी, इसलिए लड़का अक्‍सर मुझसे मिला करता है। बड़ा ही सरल, सभ्‍य और सीधा लड़का है। साथ ही कुशाग्रबुद्धि थी।

एक दिन मैंने पूछा, 'क्‍यों, तुम्‍हारा सब काम ठीक जम गया न? कोई तकलीफ तो नहीं है उन सज्‍जन के यहाँ?'

वह तनिक मुस्‍कराया, कहने लगा, 'तकलीफ तो नहीं है, पर वहाँ एक बात बड़ी विचित्र और मनोरंजक है।'

'क्‍या बात है?' मैंने पूछा। Read More : रसोई घर और पाखाना - हरिशंकर परसाई about रसोई घर और पाखाना - हरिशंकर परसाई

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