व्यंग्य

मुंडन - हरिशंकर परसाई

लेखक: 
हरिशंकर परसाई

किसी देश की संसद में एक दिन बड़ी हलचल मची। हलचल का कारण कोई राजनीतिक समस्या नहीं थी, बल्कि यह था कि एक मंत्री का अचानक मुंडन हो गया था। कल तक उनके सिर पर लंबे घुँघराले बाल थे, मगर रात में उनका अचानक मुंडन हो गया था।

सदस्यों में कानाफूसी हो रही थी कि इन्हें क्या हो गया है। अटकलें लगने लगीं। किसी ने कहा - शायद सिर में जूँ हो गई हों। दूसरे ने कहा - शायद दिमाग में विचार भरने के लिए बालों का पर्दा अलग कर दिया हो। किसी और ने कहा - शायद इनके परिवार में किसी की मौत हो गई। पर वे पहले की तरह प्रसन्न लग रहे थे। Read More : मुंडन - हरिशंकर परसाई about मुंडन - हरिशंकर परसाई

अपनी अपनी बीमारी - हरिशंकर परसाई

लेखक: 
हरिशंकर परसाई

हम उनके पास चंदा माँगने गए थे। चंदे के पुराने अभ्यासी का चेहरा बोलता है। वे हमें भाँप गए। हम भी उन्हें भाँप गए। चंदा माँगनेवाले और देनेवाले एक-दूसरे के शरीर की गंध बखूबी पहचानते हैं। लेनेवाला गंध से जान लेता है कि यह देगा या नहीं। देनेवाला भी माँगनेवाले के शरीर की गंध से समझ लेता है कि यह बिना लिए टल जाएगा या नहीं। हमें बैठते ही समझ में आ गया कि ये नहीं देंगे। वे भी शायद समझ गए कि ये टल जाएँगे। फिर भी हम दोनों पक्षों को अपना कर्तव्य तो निभाना ही था। हमने प्रार्थना की तो वे बोले - आपको चंदे की पड़ी है, हम तो टैक्सों के मारे मर रहे हैं। सोचा, यह टैक्स की बीमारी कैसी होती है। बीमारियाँ बहुत दे Read More : अपनी अपनी बीमारी - हरिशंकर परसाई about अपनी अपनी बीमारी - हरिशंकर परसाई

यस सर - हरिशंकर परसाई

यस सर - हरिशंकर परसाई
लेखक: 
हरिशंकर परसाई

एक काफी अच्छे लेखक थे। वे राजधानी गए। एक समारोह में उनकी मुख्यमंत्री से भेंट हो गई। मुख्यमंत्री से उनका परिचय पहले से था। मुख्यमंत्री ने उनसे कहा - आप मजे में तो हैं। कोई कष्ट तो नहीं है? लेखक ने कह दिया - कष्ट बहुत मामूली है। मकान का कष्ट। अच्छा सा मकान मिल जाए, तो कुछ ढंग से लिखना-पढ़ना हो। मुख्यमंत्री ने कहा - मैं चीफ सेक्रेटरी से कह देता हूँ। मकान आपका 'एलाट' हो जाएगा।

मुख्यमंत्री ने चीफ सेक्रेटरी से कह दिया कि अमुक लेखक को मकान 'एलाट' करा दो।

चीफ सेक्रेटरी ने कहा - यस सर।

चीफ सेक्रेटरी ने कमिश्नर से कह दिया। कमिश्नर ने कहा - यस सर। Read More : यस सर - हरिशंकर परसाई about यस सर - हरिशंकर परसाई

भारत को चाहिए जादूगर और साधु - हरिशंकर परसाई

हरिशंकर परसाई
लेखक: 
हरिशंकर परसाई

हर 15 अगस्त और 26 जनवरी को मैं सोचता हूँ कि साल-भर में कितने बढ़े। न सोचूँ तो भी काम चलेगा - बल्कि ज्यादा आराम से चलेगा। सोचना एक रोग है, जो इस रोग से मुक्त हैं और स्वस्थ हैं, वे धन्य हैं।

यह 26 जनवरी 1972 फिर आ गया। यह गणतंत्र दिवस है, मगर 'गण' टूट रहे हैं। हर गणतंत्र दिवस 'गण' के टूटने या नए 'गण' बनने के आंदोलन के साथ आता है। इस बार आंध्र और तेलंगाना हैं। अगले साल इसी पावन दिवस पर कोई और 'गण' संकट आएगा। Read More : भारत को चाहिए जादूगर और साधु - हरिशंकर परसाई about भारत को चाहिए जादूगर और साधु - हरिशंकर परसाई

शर्म की बात पर ताली पीटना - हरिशंकर परसाई

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हरिशंकर परसाई

मैं आजकल बड़ी मुसीबत में हूँ।

मुझे भाषण के लिए अक्सर बुलाया जाता है। विषय यही होते हैं - देश का भविष्य, छात्र समस्या, युवा-असंतोष, भारतीय संस्कृति भी (हालांकि निमंत्रण की चिट्ठी में 'संस्कृति' अक्सर गलत लिखा होता है), पर मैं जानता हूँ जिस देश में हिंदी-हिंसा आंदोलन भी जोरदार होता है, वहाँ मैं 'संस्कृति' की सही शब्द रचना अगर देखूँ तो बेवकूफ के साथ ही 'राष्ट्र-द्रोही' भी कहलाऊँगा। इसलिए जहाँ तक बनता है, मैं भाषण ही दे आता हूँ। Read More : शर्म की बात पर ताली पीटना - हरिशंकर परसाई about शर्म की बात पर ताली पीटना - हरिशंकर परसाई

आवारा भीड़ के खतरे हरिशंकर परसाई

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हरिशंकर परसाई

एक अंतरंग गोष्ठी सी हो रही थी युवा असंतोष पर। इलाहाबाद के लक्ष्मीकांत वर्मा ने बताया - पिछली दीपावली पर एक साड़ी की दुकान पर काँच के केस में सुंदर साड़ी से सजी एक सुंदर मॉडल खड़ी थी। एक युवक ने एकाएक पत्थर उठाकर उस पर दे मारा। काँच टूट गया। आसपास के लोगों ने पूछा कि तुमने ऐसा क्यों किया? उसने तमतमाए चेहरे से जवाब दिया - हरामजादी बहुत खूबसूरत है। Read More : आवारा भीड़ के खतरे हरिशंकर परसाई about आवारा भीड़ के खतरे हरिशंकर परसाई

घायल वसंत - हरिशंकर परसाई

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हरिशंकर परसाई

कल बसंतोत्सव था। कवि वसंत के आगमन की सूचना पा रहा था -

प्रिय, फिर आया मादक वसंत।

मैंने सोचा, जिसे वसंत के आने का बोध भी अपनी तरफ से कराना पड़े, उस प्रिय से तो शत्रु अच्छा। ऐसे नासमझ को प्रकृति-विज्ञान पढ़ाएँगे या उससे प्यार करेंगे। मगर कवि को न जाने क्यों ऐसा बेवकूफ पसंद आता है ।

कवि मग्न होकर गा रहा था -

'प्रिय, फिर आया मादक वसंत !' Read More : घायल वसंत - हरिशंकर परसाई about घायल वसंत - हरिशंकर परसाई

किस भारत भाग्य विधाता को पुकारें - हरिशंकर परसाई

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हरिशंकर परसाई

मेरे एक मुलाकाती हैं। वे कान्यकुब्ज हैं। एक दिन वे चिंता से बोले - अब हम कान्यकुब्जों का क्या होगा? मैंने कहा - आप लोगों को क्या डर है? Read More : किस भारत भाग्य विधाता को पुकारें - हरिशंकर परसाई about किस भारत भाग्य विधाता को पुकारें - हरिशंकर परसाई

दो नाक वाले लोग - हरिशंकर परसाई

लेखक: 
हरिशंकर परसाई

मैं उन्हें समझा रहा था कि लड़की की शादी में टीमटाम में व्यर्थ खर्च मत करो।

पर वे बुजुर्ग कह रहे थे - आप ठीक कहते हैं, मगर रिश्तेदारों में नाक कट जाएगी।

नाक उनकी काफी लंबी थी। मेरा ख्याल है, नाक की हिफाजत सबसे ज्यादा इसी देश में होती है। और या तो नाक बहुत नर्म होती है या छुरा बहुत तेज, जिससे छोटी-सी बात से भी नाक कट जाती है। छोटे आदमी की नाक बहुत नाजुक होती है। यह छोटा आदमी नाक को छिपाकर क्यों नहीं रखता? Read More : दो नाक वाले लोग - हरिशंकर परसाई about दो नाक वाले लोग - हरिशंकर परसाई

पुलिस मंत्री का पुतला - हरिशंकर परसाई

लेखक: 
हरिशंकर परसाई

एक राज्य में एक शहर के लोगों पर पुलिस-जुल्म हुआ तो लोगों ने तय किया कि पुलिस-मंत्री का पुतला जलाएँगे।

पुतला बड़ा कद्दावर और भयानक चेहरेवाला बनाया गया।

पर दफा 144 लग गई और पुतला पुलिस ने जब्त कर लिया।

अब पुलिस के सामने यह समस्या आ गई कि पुतले का क्या किया जाए। पुलिसवालों ने बड़े अफसरों से पूछा, ‘साहब, यह पुतला जगह रोके कब तक पड़ा रहेगा? इसे जला दें या नष्ट कर दें?’

अफसरों ने कहा, ‘गजब करते हो। मंत्री का पुतला है। उसे हम कैसे जलाएँगे? नौकरी खोना है क्या?’ Read More : पुलिस मंत्री का पुतला - हरिशंकर परसाई about पुलिस मंत्री का पुतला - हरिशंकर परसाई

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