स्वर मध्यम का शास्त्रीय परिचय

स्वर मध्यम का शास्त्रीय परिचय
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मध्यम स्वर साम की उद्गीथ भक्ति के तुल्य हो सकता है। इसे सूर्य की सबसे विकसित स्थिति, मध्याह्न काल की स्थिति के रूप में समझा जा सकता है।

मध्यम स्वर को समझने का एक माध्यम शुनःशेप आख्यान को बनाया जा सकता है। आख्यान इस प्रकार है कि हरिश्चन्द्र को पुत्र रोहित वरुण की कृपा से प्राप्त हुआ था और वरुण ने मांग की कि उसे पुत्र की बलि दी जाए। जब रोहित ने यह सुना तो वह जंगल में भाग गया और सात साल बाद लौटा। लौटने पर उसने अपने स्थान पर अजीगर्त के पुत्र शुनःशेप को बलि हेतु तैयार कर लिया। इसके लिए उसने अजीगर्त को कुछ गाएं दी। शुनःशेप ने यज्ञ में अपने जीवन की रक्षा के लिए विभिन्न देवों की स्तुति की। अन्त में यज्ञ के होता? विश्वामित्र ने शुनःशेप को अपना ज्येष्ठ पुत्र बनाने का प्रस्ताव किया जिसे शुनःशेप ने स्वीकार कर लिया। लेकिन विश्वामित्र के १०० पुत्रों में से ज्येष्ठ ५० पुत्रों ने शुनःशेप का कनिष्ठ भ्राता बनना स्वीकार नहीं किया और उन्हें विश्वामित्र ने शाप दे दिया कि उनके वंशज दस्यु आदि हों। शेष ५० पुत्रों ने, जिनमें ज्येष्ठ मधुच्छन्दा था, शुनःशेप का अनुज बनना स्वीकार कर लिया। यह ध्यान देने योग्य है कि शुनःशेप के पिता अजीगर्त ने शुनःशेप का विक्रय इसलिए किया क्योंकि उनके लिए वह उपयोगी नहीं था। ज्येष्ठ पुत्र तो पिता को प्रिय था, कनिष्ठ माता को, और मध्यम पुत्र शुनःशेप किसी को नहीं। विश्वामित्र द्वारा शुनःशेप को पुत्र बना लिए जाने से विश्वामित्र को ब्राह्मणत्व का लाभ हुआ। यह ध्यान देने योग्य है कि शुनः का क्या अर्थ हो सकता है। लक्ष्मीनारायण संहिता १.५७३.३२ के अनुसार यदि शिव की अर्चना की जाती है लेकिन पार्वती की नहीं, तो यह शुनः की स्थिति है। यदि शुनःशेप मध्यम स्वर का प्रतीक है तो रोहित कौन से स्वर का प्रतीक हो सकता है, यह अन्वेषणीय है। रोहित भ्रमणप्रिय है(चरैवैति), अतः यह गान्धार हो सकता है। रोहित के विकास तक की स्थिति वरुण से(कार्य-कारण सम्बन्ध?) बद्ध है। रोहित को इस बन्धन से मुक्त करना है। यह मध्यम स्वर की स्थिति हो सकती है।

मध्यम स्वर को समझने के लिए मध्यम स्वर के बृहती छन्द होने के उल्लेख का आश्रय लिया जा सकता है। बृहती छन्द की स्थिति गवामयन याग में छह मास के पश्चात् आती है। गवामयन याग के पहले छह मास विश्वजित् कहलाते हैं तथा बाद के छह मास सर्वजित्। बीच का दिन दिवाकीर्त्यं अह कहलाता है। कहा गया है कि इस दिन सूर्य की किरणें पृथिवी पर विषुवत् रेखा के अनुदिश पडती हैं। यह बृहती छन्द की स्थिति कही गई है। गवामयन याग का संक्षिप्त स्वरूप यह है कि एक श्येन के दो पक्षों का निर्माण करना होता है जो छह-छह महीनों में किया जाता है। इस प्रकार यह श्येन उडने लायक बन जाता है। मध्य में आत्मा का स्थान होता है। छह-छह महीनों के बीच के कुछ दिन बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। दिवाकीर्त्यं अह पर एक आख्यान का उच्चारण किया जाता है कि स्वर्भानु असुर ने सूर्य को ढंक लिया था। इस दिन स्वर्भानु असुर का वध हो जाता है और सूर्य कलंकरहित हो जाता है। विश्वजित् और सर्वजित् का क्या अर्थ हो सकता है, इसका विवेचन करना कठिन है, लेकिन गर्ग संहिता में एक विश्वजित् खण्ड है जिसके आधार पर विश्वजित् को समझने का प्रयत्न किया जा सकता है।

यदि क्रौञ्च द्वीप की प्रकृति के आधार पर मध्यम स्वर को समझने का प्रयत्न किया जाता है तो क्रौञ्च शब्द की टिप्पणी में क्रौञ्च की तीन स्थितियां दी गई हैं- क्रन्दन या प्रकृति रूप, पुरुष-प्रकृति का मिथुन रूप और पुरुष रूप। शुक्ल यजुर्वेद में क्रुङ् आंगिरस का उल्लेख आता है जो धी द्वारा आपः से क्षीर का पान कर लेता है।

मध्यम स्वर को समझने का एक प्रयत्न पुष्कर द्वीप के तीन प्रकारों- ज्येष्ठ, मध्यम और कनिष्ठ प्रकारों से किया जा सकता है। ज्येष्ठ पुष्कर में ब्रह्मा सोमयाग का अनुष्ठान करते हैं जिसमें उनकी पत्नी सावित्री नहीं आती, अतः उस यज्ञ का अनुष्ठान एक गोपकन्या को गौ के माध्यम से पवित्र करके उसकी गायत्री रूप में प्रतिष्ठा द्वारा किया जाता है। गायत्री सावित्री के स्थान पर ब्रह्मा की पत्नी बनती है। मध्यम पुष्कर में तप करते समय परशुराम अपनी असफलता का कारण मृग-मृगी के वार्तालाप के रूप में सुनते हैं कि यदि परशुराम कनिष्ठ पुष्कर में जाकर अगस्त्य से कृष्ण प्रेमामृत स्तोत्र सीख लें तो उन्हें सफलता मिल सकती है। अतः यह कहा जा सकता है कि जिस स्थिति में मृग रूपी अन्तरात्मा की आवाज बोलने लगे, वह मध्यम स्वर है। मध्यम स्वर की तुलना पृष्ठ्य षडह नामक सोमयाग के चतुर्थ अह से की जा सकती है। इस दिवस के लक्षण प्रथम दिवस के समान ही हैं, लेकिन उन लक्षणों में जातवत्, हववत्, शुक्रवत्, वाक् रूप, वैमद, विरिफित, विच्छन्द, ऊनातिरिक्त, वैराज, अनुष्टुप् आदि लक्षण और जुड जाते हैं। जातवत् लक्षण से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि षड्ज स्वर की स्थिति में जो लक्षण गर्भरूप में थे, मध्यम स्वर की स्थिति में वही लक्षण अब बाहर प्रकट हो गए हैं।  

मध्यमः

*नादः समुत्थितो नाभेरुरःकण्ठसमाहृतः। नाभिं प्राप्तः पुनर्मध्यस्थानगो मध्यमः स्मृतः।। - पण्डितमण्डली

*मध्यमश्चैकवक्त्रः स्याद्धैमवर्णश्चतुःकरः। सवीणाकलशी हस्तौ सपद्मवरदौ तथा।। भारती दैवतं द्वीपं कुशं वंशं सुपर्वजम्। गाता चन्द्रो रसश्शान्तः क्रौञ्चो वाहनमस्य तु।। - सुधाकलशः

*बृहतीछन्दः, हास्यशृङ्गारौ रसौ, ऋष्यादौ विनियोगः। क्रौञ्चः क्वणति, देवकुलसंभवः, कुन्दवर्णः, ब्राह्मणजातिः, क्रौञ्चद्वीपजः, महोलोकवासी, काश्मीरवासी, सौम्यवासरजः, यजुर्वेदी, माध्यन्दिनी शाखा, त्रिंशद्वर्षः, कलाचतुष्ट्यवान्, स्वरकर्मणि प्रयुक्तः, चतुःश्रुतिः। - पण्डितमण्डली

*मध्यमो मध्यमस्थानाच्छरीरस्योपजायते। अभिमूलाच्च गम्भीरः किञ्चित्तारस्वभावतः।। - सङ्गीतसरणिः

*मध्यमस्वरमन्त्रः – तत्वं हृदयाय नमः। ओखः शिरसे स्वाहा। अनुगतः शिखायै वषट्। समः कवचाय हुम्। उपरि नेत्रत्रयाय वौषट्। उपपदास्त्राय फट्। मित्र ऋषिः सुप्रतिष्ठा छन्दः। सावित्री देवता। ऐं क्लीं सैं मं नमः। - जगदेकः

*मध्यमस्वराभिनयः – पताकौ स्वस्तिकौ कृत्वा शिरसा विधुतेन च। शैवाख्यस्थानकेनापि कटिछिन्नेन वा पुनः। दृष्ट्या च हास्यया धीरैरभिनेयोऽत्र मध्यमः।। - दामोदरः

*ततस्तु मध्यमो नाम कल्पोऽष्टादश उच्यते। यस्मिंस्तु मध्यमो नाम स्वरो धैवतपूजितः। उत्पन्नः सर्वभूतेषु मध्यमो वै स्वयंभुवः।। - वायु पुराण २१.३६

     लौकिक संगीत में कोई राग किस समय गाया जाएगा, इसका निर्णय आंशिक रूप में मध्यम स्वर के शुद्ध अथवा तीव्र होने से किया जाता है। तीव्र से लगता है कि अभिप्राय यह है कि मध्यम स्वर की ध्वनि की आवृत्ति पंचम स्वर के समकक्ष या उससे भी अधिक हो जाएगी। छान्दोग्य उपनिषद २.२२ में उद्गीथ की निम्नलिखित स्थितियों का उल्लेख है—

अग्नेरुद्गीथोऽनिरुक्तः प्रजापतेर्निरुक्तः सोमस्य मृदु श्लक्ष्णं वायोः श्लक्ष्णं बलवदिन्द्रस्य क्रौञ्चं बृहस्पतेरपध्वान्तं वरुणस्य तान्सर्वानेवोपसेवेत वारुणं त्वेव वर्जयेत्।

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