स्वर षड्ज का शास्त्रीय परिचय

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ऐतरेय ब्राह्मण ४.२९ में पृष्ठ्य षडह नामक सोमयाग के प्रथम दिवस के लक्षणों का उल्लेख है। इन लक्षणों में से एक है – करिष्यत्, अर्थात् जो भविष्य में किया जाने वाला अथवा होने वाला है। जो कुछ भविष्य में होने वाला है, जैसे आज जो गर्भ रूप में है, कल वह जन्म लेगा। गर्भ को बाहर से प्रभावित किया जा सकता है। यह षड्ज स्वर का उद्देश्य हो सकता है। करिष्यत् लक्षण के साथ-साथ अन्य लक्षणों का भी उल्लेख है – जैसे एति और प्रेति, युक्तवत्, रथवत्, आशुमत्, पिबवत्, अभ्युदित, राथन्तर, गायत्र, मन्त्र के प्रथम पद में देवता का उल्लेख आदि। एति से तात्पर्य है कि बाहर से, ब्रह्माण्ड से, सूर्य से ऊर्जा का ग्रहण किया जाता है। प्रेति से तात्पर्य है कि गर्भ में स्थित चेतना बाहरी वातावरण को प्रभावित करती है। यज्ञ के संदर्भ में कहा गया है कि अग्नि से उत्पन्न धूम चन्द्रमा में जाकर उसका काला भाग उत्पन्न करता है जो देवयजन प्रदेश बनता है। एति के संदर्भ में कहा गया है कि पृथिवी पर जो ऊष/ऊसर(जहां कुछ नहीं उग सकता) प्रदेश है, वह सूर्य की ऊर्जा का रूप है जो पोषण प्रदान करता है। अभ्युदित लक्षण संकेत करता है कि वास्तविक स्थिति गर्भ की नहीं है, अपितु अभी-अभी उदित हुए सूर्य की है। इन लक्षणों की षड्ज स्वर के संदर्भ में व्याख्या कैसे की जा सकती है, यह भविष्य में अन्वेषणीय है।

     षड्ज स्वर को साम की हिंकार भक्ति के तुल्य माना जा सकता है। हिंकार स्थिति में गुण अनिरुक्त/अव्यक्त/अविकसित स्थिति में, गर्भ रूप स्थिति में रहते हैं। छान्दोग्य उपनिषद में जिन गुणों की गणना हिंकार के अन्तर्गत की गई है, उनमें से कुछ प्राण, वाक्, मन आदि हो सकते हैं। यही गुण जब विकसित हो जाएंगे तो यह अगली भक्ति प्रस्ताव या ऋषभ बन जाएंगे। भागवत पुराण १०.४१ आदि में वसुदेव व देवकी के षड्गर्भ संज्ञक पुत्रों की कथा आती है जिन्हें एक-एक करके कंस ने मारा था। इनके नाम भागवत पुराण में स्मर, उद्गीथ, परिष्वङ्ग, पतङ्ग, क्षुद्रभृत् व घृणि हैं लेकिन अन्य पुराणों में यह भिन्न नाम हैं(कीर्त्तिमान, सुषेण, उदायु, भद्रसेन, ऋजदास, भद्रदेव)। इन नामों से षड्ज स्वर के विषय में क्या नई सूचना ग्रहण की जा सकती है, यह अन्वेषणीय है। हो सकता है यह अगली छह भक्तियों के ही अविकसित रूप हों।

श्रीमती विमला मुसलगाँवकर की पुस्तक ‘भारतीय संगीत शास्त्र का दर्शनपरक अनुशीलन’ में पृष्ठ १३९ पर उल्लेख है कि विशुद्धि चक्र की स्थिति कण्ठ में है। यह सोलह दल वाला होता है। यह भारती देवी(सरस्वती) का स्थान है। इसके पूर्वादि दिशाओं वाले दलों पर ध्यान का फल क्रमशः १-प्रणव, २-उद्गीथ, ३-हुंफट्, ४- वषट्, ५-स्वधा(पितरों के हेतु), ६-स्वाहा(देवताओं के हेतु), ७-नमः, ८-अमृत, ९-षड्ज, १०-ऋषभ, ११-गान्धार, १२-मध्यम, १३-पञ्चम, १४- धैवत, १५-निषाद, १६-विष – ये सोलह फल होते हैं। यह अन्वेषणीय है कि प्रणव, उद्गीथ आदि का षड्गर्भ के साथ तादात्म्य है या नहीं।

*चतस्रः शुक्लवर्धन्यः तासु कन्दसमाश्रयः। तद्भवत्वात् षड्जस्य चतुश्श्रुतित्वम्।।

कन्दः मूलाधारः। षड्जो विप्रः। पद्मपत्रप्रभः। ब्रह्मदैवत्तः अग्निना प्रथमं गीतः। वीररौद्राद्भुतेषु प्रवर्तते। कण्ठादुत्तिष्ठते। सनकः ऋषिः सुप्रतिष्ठा छन्दः गौरी अधिदेवता। ऋषभे राशौ विश्रामः। मयूराः ब्रुवते। शुक्लस्त्वग्निजो नादः स्वरः षड्जः चतुःश्रुतिः। - जगदेकः

उपरोक्त कथन में षड्ज स्वर के ऋषभ राशि में विश्राम करने का उल्लेख ध्यान देने योग्य है। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, षड्ज रूपी अविकसित स्वर की अगली स्थिति विकसित स्थिति ऋषभ है। चूंकि उपरोक्त कथन में मयूरों को षड्ज स्वर में बोलते हुए कहा गया है, अतः अनुमान यह है कि षड्ज स्वर शरीर में प्रतिध्वनि को सूचित करता है।

 

*वायुः सम्मूर्छतो नाभेर्नाड्याश्च हृदयस्य च। पार्श्वयोर्मस्तकस्यापि षण्णां षड्जः प्रजायते।। - नारायणः

*अतिस्वारात्समुत्पन्नो षड्जोऽयं प्रथमः स्वरः। - जगदेकः

अतिस्वारः। सामसु सप्तस्वन्यतमः

*नासा कण्ठमुरस्तालुजिह्वादन्तांश्च चालयन्। षड्भिस्सञ्जायते यस्मात्तस्मात् षड्जोऽयमुच्यते।। - पुरुषोत्तमः

*प्रकार्थस्य शुयतेःहि गत्यर्थे षड्जेः कृति। टिलोपे षड्ज इत्युक्तः स्वरेषूत्कर्षकारकः।। - कुम्भः

*षड्जस्वरमन्त्रः – षड्जग्रामः हृदयाय नमः। मध्यमग्रामः शिरसे स्वाहा। गान्धारग्रामः शिखायै वषट्। षाडवः कवचाय हुम्। औडुवः नेत्रत्रयाय वौषट्। संपूर्णः अस्त्राय फट्। सनक ऋषिः सुप्रतिष्ठा छन्दः गौरी देवता। ऐं श्रीं गीं संनमः। - जगदेकः

*षड्जाभिनयः – दक्षिणेनालपद्मेन वामेन चतुरेण तु। परिमण्डलितेनाथ मयूरललितेन च। एवं विनिर्दिशेत् षड्जं कोविदो नाट्यनृत्तयोः।। - दामोदरः

*षड्जस्तु षोडशः कल्पः षड् जना यत्र चर्षयः। शिशिरश्च वसन्तश्च निदाघो वर्ष एव च। शरद्धेमन्त इत्येते मानसा ब्रह्मणः सुताः। उत्पन्नाः षड्ज संसिद्धाः पुत्राः कल्पे तु षोडशे। यस्माज्जातैश्च तैः षड्भिः सद्यो जातो महेश्वरः। तस्मात् समुत्थितः षड्जः स्वरस्तूदधिसन्निभः।। - वायु पुराण २१.३४

षड्ज स्वर की उत्पत्ति के संदर्भ में वायु पुराण का कथन है कि वसन्त, ग्रीष्म आदि ६ ऋतुओं की उत्पत्ति ब्रह्मा के मानस पुत्रों के रूप में  हुई जो षड्ज में संसिद्ध थे तथा उनके उत्पन्न होने के पश्चात् सद्योजात महेश्वर का जन्म हुआ। अध्यात्म में ऋतुओं का क्या अर्थ हो सकता है, इसका एक संकेत जैमिनीय ब्राह्मण २.५१ से मिलता है जहां ऋतुओं की तुलना प्राणों से की गई है। वसन्त को प्राण, वाक् को ग्रीष्म, चक्षु को वर्षा, श्रोत्र को शरद, मन को हेमन्त और पुरुष में स्थित आपः(प्राणों का सम्मिलित रूप) को शिशिर कहा गया है। इसका कारण भी बताया गया है, जैसे चक्षु वर्षा की भांति आर्द्र है। जब ६ ऋतुओं के रूप में प्राण, वाक्, चक्षु, श्रोत्र, मन और आपः सहयोग करेंगे, तभी षड्ज स्वर की उत्पत्ति हो सकती है।  ६ ऋतुओं की उत्पत्ति का अर्थ होगा पूरा संवत्सर। भौतिक जगत में पृथिवी, सूर्य और चन्द्रमा के परस्पर मिलने से संवत्सर का जन्म होता है। अध्यात्म में वाक्, प्राण और मन के मिलने से संवत्सर का जन्म होता है। लेकिन जैमिनीय ब्राह्मण के कथन में ३ के बदले ६ के मिलन का उल्लेख है। लगभग एक संवत्सर पूर्ण होने पर ही गर्भ बाहर प्रकट होता है। लेकिन साधना में यह आवश्यक नहीं है कि ६ ऋतुओं के प्रकट होने के लिए पूरे एक संवत्सर की प्रतीक्षा की जाए। ६ ऋतुएं इसी क्षण प्रकट हो सकती हैं।  वैदिक कर्मकाण्ड के अनुसार ६ ऋतुओं का जन्म सोमयाग में सोम की आहुति देते समय वौषट् शब्द के उच्चारण से होता है। जैसे सामान्य यज्ञ में आहुति देते समय स्वाहा का उच्चारण किया जाता है, इसी प्रकार सोमयाग में सोम की आहुति देते समय वौषट् का उच्चारण किया जाता है। ऐतरेय ब्राह्मण का कथन है कि असौ वाव वौ, ऋतवः षट् । यहां वौ से तात्पर्य सूर्य से है। सूर्य के अवतरण पर इस पृथिवी पर ६ ऋतुओं का जन्म होता है। वौषट् के कईं एक प्रयोजन हैं । एक तो प्रयोजन सूर्य का अवतरण हो गया। दूसरा प्रयोजन वर्षा का आगमन है। वौषट् के उच्चारण के पूर्व वर्षा हेतु जो कुछ अपेक्षित है, वह सब किया जाता है- जैसे पुरोवात का बहना, मेघों का सम्प्लावन, मेघों का गर्जन, विद्युत का चमकना और अन्त में वौषट् द्वारा मेघों का वर्षण होता है। तीसरा प्रयोजन वषट्कार द्वारा वृत्र का हनन कहा गया है। और कभी-कभी वषट् के उच्चारण द्वारा सोम की आहुति देने के पश्चात् अनुवषट्कार का भी उच्चारण किया जाता है जो इस प्रकार है – सोमस्याग्नेर्वीहि वौषट्। कहा जाता है कि अनुवषट्कार का उच्चारण मर्त्य स्तर के प्राणों के लिए किया जाता है। षड्ज स्वर की उत्पत्ति में जहां वायु पुराण ६ ऋतुओं को उत्तरदायी बता रहा है, संगीतशास्त्र के ग्रन्थों में इस स्वर की उत्पत्ति दन्त, कण्ठ आदि ६ स्थानों से कही जा रही है। अतः यह अन्वेषणीय है कि क्या ६ ऋतुओं का शरीर के ६ अंगों से कोई तादात्म्य है।

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