ध्यान की तैयारी

गौतम बुद्ध ज्ञान को उपलब्ध होने के बाद घर वापस लौटे

गौतम बुद्ध ज्ञान को उपलब्ध

गौतम बुद्ध ज्ञान को उपलब्ध होने के बाद घर वापस लौटे । बारह साल बाद वापस लौटे । जिस दिन घर छोड़ा था, उनका बच्चा, उनका बैटा एक ही दिन का था । राहुल एक ही दिन का था । जब आए, तो वह बारह वर्ष का हो चुका था । और बुद्ध की पत्नी- यशोधरा, बहुत नाराज थी । स्वभावत: । और उसने एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल पूछा । Read More : गौतम बुद्ध ज्ञान को उपलब्ध होने के बाद घर वापस लौटे about गौतम बुद्ध ज्ञान को उपलब्ध होने के बाद घर वापस लौटे

मृत शरीर जलाने का रहस्य

मृत शरीर जलाने

हिंदू जलाते हैं शरीर को। क्योंकि जब तक शरीर जल न जाए, तब तक आत्मा शरीर के आसपास भटकती है। पुराने घर का मोह थोड़ा सा पकड़े रखता है।तुम्हारा पुराना घर भी गिर जाए तो भी नया घर बनाने तुम एकदम से न जाओगे। तुम पहले कोशिश करोगे, कि थोड़ा इंतजाम हो जाए और इसी में थोड़ी सी सुविधा हो जाए, थोड़ा खंभा सम्हाल दें, थोड़ा सहारा लगा दें। किसी तरह इसी में गुजारा कर लें। नया बनाना तो बहुत मुश्किल होगा, बड़ा कठिन होगा। Read More : मृत शरीर जलाने का रहस्य about मृत शरीर जलाने का रहस्य

अग्नि पर फ़ोकस करना

अग्नि पर फ़ोकस करना

जीवन में मृत्यु के अतिरिक्त कुछ भी निश्चित नहीं है।

और दूसरी बात कि मृत्यु अंत में नहीं घटेगी, वह घट ही रही है। मृत्यु एक प्रक्रिया है। जैसे जीवन प्रक्रिया है, वैसे ही मृत्यु भी प्रक्रिया है। द्वैत हम निर्मित करते हैं; लेकिन जीवन और मृत्यु ठीक तुम्हारे दो पांवों की तरह हैं। जीवन और मृत्यु दोनों एक प्रक्रिया हैं। तुम प्रतिक्षण मर रहे हो।

मुझे यह बात इस तरह से कहने दो: जब तुम श्वास भीतर ले जाते हो तो वह जीवन है; और जब तुम श्वास बाहर निकालते हो तो वह मृत्यु है। Read More : अग्नि पर फ़ोकस करना about अग्नि पर फ़ोकस करना

विपस्सना कैसे की जाती है?

विपस्सना कैसे

विपस्सना मनुष्य-जाति के इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण ध्यान-प्रयोग है। जितने व्यक्ति विपस्सना से बुद्धत्व को उपलब्ध हुए उतने किसी और विधि से कभी नहीं। विपस्सना अपूर्व है! विपस्सना शब्द का अर्थ होता है: देखना, लौटकर देखना। बुद्ध कहते थे: इहि पस्सिको, आओ और देखो! Read More : विपस्सना कैसे की जाती है? about विपस्सना कैसे की जाती है?

ध्यान एक अवस्था है, जब चेतना अकेली रह जाती है।

ध्यान एक अवस्था है

ध्यान किसी का नहीं करना होता है। ध्यान एक अवस्था है, जब चेतना अकेली रह जाती है। जब चेतना अकेली रह जाए और चेतना के सामने कोई विषय, कोई आब्जेक्ट न हो, उस अवस्था का नाम ध्यान है। मैं ध्यान का उसी अर्थ में प्रयोग कर रहा हूं। 
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किसी का ध्यान नहीं करना है, अपने भीतर ध्यान में पहुंचना है।

किसी का ध्यान नहीं करना है

रामकृष्ण को ऐसा हुआ था। वे काली के ऊपर ध्यान करते थे, धारणा करते थे। फिर धीरे-धीरे उनको ऐसा हुआ कि काली के उनको साक्षात होने लगे अंतस में। आंख बंद करके वह मूर्ति सजीव हो जाती। वे बड़े रसमुग्ध हो गए, बड़े आनंद में रहने लगे। फिर वहां एक संन्यासी का आना हुआ। और उस संन्यासी ने कहा कि ‘तुम यह जो कर रहे हो, यह केवल कल्पना है, यह सब इमेजिनेशन है। यह परमात्मा का साक्षात नहीं है।’ रामकृष्ण ने कहा, ‘परमात्मा का साक्षात नहीं है? मुझे साक्षात होता है काली का।’ उस संन्यासी ने कहा, ‘काली का साक्षात परमात्मा का नहीं है।’ 
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ओशो – तुम कौन हो ?

ओशो – तुम कौन हो ?

तुम भी बिलकुल भूल गए हो कि तुम कौन हो। और जन्मों-जन्मों में तुम बहुत जगह गए हो, बहुत यात्राएं की हैं। और उन यात्राओं में तुम अभी भी भटक रहे हो। कोई चाहिए जो सूत्र पकड़ा दे; तुम्हें थोड़ी सी याद आ जाए; तुम अपने घर के सामने खड़े हो जाओ। एक बार याद आ जाए तुम्हें भीतर के परमात्मा की, फिर सब धीरे-धीरे याद आ जाएगा। Read More : ओशो – तुम कौन हो ? about ओशो – तुम कौन हो ?

ओशो – पहले विचार फिर निर्विचार !

पहले विचार फिर निर्विचार

मनुष्य को समझने के लिए सबसे पहला तथ्य यह समझ लेना जरुरी है कि मनुष्य के जीवन में जो चीजें सहयोगी होती हैं , 

एक सीमा पर जाकर वे ही चीजें बाधक हो जाती हैं । अगर कोई 

आदमी सोचे भी , विचार भी करे , तो भी इस महत्वपूर्ण तथ्य का

एकदम से दर्शन नहीं होता है ।

क्योंकि हम सोचते हैं , जो सहायक है , वह कभी बाधक नहीं होगा । लेकिन हर सहायक चीज एक सीमा पर बाधक हो जाती है 
अगर कोई आदमी किसी मकान की सीढ़ियां चढ़ता हो , सीढियां बिना चढे़ वह मकान के ऊपर नहीं पहुंच सकता । Read More : ओशो – पहले विचार फिर निर्विचार ! about ओशो – पहले विचार फिर निर्विचार !

ओशो – एकाग्रता का महत्व

ओशो – एकाग्रता का महत्व

यह जो संगीत के खंड तुम भीतर इकट्ठे कर लोगे, इनको खंडों की भांति इकट्ठा मत करना, इनके बीच संबंध भी खोजना। Read More : ओशो – एकाग्रता का महत्व about ओशो – एकाग्रता का महत्व

जागरण की तीन सीढ़ियां हैं।

जागरण की तीन सीढ़ियां हैं।

जागरण की तीन सीढ़ियां हैं।

 

पहली सीढ़ी—

प्राथमिक जागरण। 

बुरे का अंत हो जाता है और 

शुभ की बढ़ती होती है। 

अशुभ विदा होता होता है, 

शुभ घना होता है। 
द्वितीय चरण—

शुभ विदा होने गलता है, 

शून्य घना होता है। और 
तृतीय चरण-

शून्य भी विदा हो जाता है। 

तब जो सहज…तब जो सहज

अवस्था रह जाती है, 

जो शुद्ध चैतन्य रह जाता है बोधमात्र, 

वही बुद्धावस्था है, वही निर्वाण है।
शुरू करो जागना, 

तो पहले तुम पाओगे जो 

गलत है छूटने लगा।

जागकर सिगरेट पियो,  Read More : जागरण की तीन सीढ़ियां हैं। about जागरण की तीन सीढ़ियां हैं।

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Dr. Popat Sonawane - Orthopaedic Surgeon, ghodnadi-shirur

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